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Varanasi, UP, India
Working with an MNC called Network 18, some call it news channel(IBN7), but i call it दफ्तर, journalist by heart and soul, and i question everything..

July 01, 2009

बाबरी विध्वंस-एक काले इतिहास का स्याह पटाक्षेप


लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आने के साथ ही कांग्रेस और बीजेपी में तू-तू-मैं-मैं तेज हो गई है। बीजेपी को आशंका है कि उसके कई नेताओं की तरफ उंगलियां उठ सकती है। इसलिए वो बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के मामले में कांग्रेस पर उंगली उठा रही है। उधर, कांग्रेस भी इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने में जुट गई है। लेकिन एक बात तय करनी पड़ेगी कि राजनीति में आखिर नुकसान किसका हुआ। किसने इस उन्माद को झेला, बाबरी विध्वंस में कौन था जो कि उसके मलबे में दब के घुट-घुट कर जी रहा है।

मंगलवार को जस्टिस लिब्राहन ने 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। और इसी के साथ विवादों का पिटारा खुल गया। बाबरी मस्जिद तोड़े जाने वक्त बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बीजेपी के मौजूद महासचिव विनय कटियार लिब्राहन आयोग की मंशा पर ही सवाल उठा रहे हैं हालांकि अभी रिपोर्ट के नतीजे सार्वजनिक नहीं हुए हैं। विनय के निशाने पर कांग्रेस की तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार भी है।

बीजेपी के इस रुख पर कांग्रेस भला क्यों चुप रहती। उसने भी पलटवार करने में देर नहीं की। मनीष तिवारी ने तो हद ही कर दी। उनका कहना था कि क्या बीजेपी वाले वहां जलेबी लेने गए थे। आरोप प्रत्यारोप में लगता है नेताओं ने गरिमा की तिलांजली ही दे दी। क्या बाबरी विध्वंस एक मजाक था। क्या वो सिर्फ सैर सपाटे के लिए गए कुछ लोगों का उन्माद था। साफ है कि लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट बीजेपी और कांग्रेस के बीच जंग का नया मुद्दा बनने वाली है। ये जंग रिपोर्ट के खुलासे के बाद तेज हो सकती है। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार और नेताओं के बीच छिड़ी जंग से मूर्छित पड़ी बीजेपी इस मुद्दे को भड़काकर अपनी सेहत दुरुस्त करना चाहेगी तो कांग्रेस इस फिराक में है कि आयोग की सिफारिशों के मुताबिक कार्रवाई करके वो केंद्र में सरकार रहने के बावजूद बाबरी मस्जिद न बचा पाने का दाग धो डाले।

6 दिसंबर, इस एक दिन ने भारतीय राजनीति की धुरी बदल दी। वो दिन जब सैकड़ों कारसेवकों ने कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को जमींदोज कर दिया। 17 साल बाद भी ये 6 दिसंबर 1992 का सच आज भी भारतीय लोकतंत्र पर एक शूल की तरह चुभ रहा है। ये वो कहानी है तो जो धर्म की राजनीति की नींव बनीं।

सुबह 11 बजे के करीब कारसेवकों के एक बड़े जत्थे ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की थी लेकिन पुलिस ने उन्हें वापस धकेल दिया गया। इसी वक्त वहां नजर आए वीएचपी नेता अशोक सिंघल कारसेवकों से घिरे हुए उन्हें कुछ समझाते हुए थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी भी जुड़ गए। तुरंत ही इस भीड़ में लाल कृष्ण आडवाणी भी नजर आए। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद थे और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ रहे थे।

तभी पहली बार मस्जिद का बाहरी दरवाजा तोड़ने की कोशिश हुई लेकिन पुलिस ने उसे नाकाम कर दिया। तस्वीरें गवाह हैं कि इस दौरान पुलिस अधिकारी दूर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे। मचान पर बैठे हुए इन अफसरों को मस्जिद बचाने की चिंता कितनी थी कहना मुश्किल था। जब प्रशासन ही हाथ पे हाथ धरा बैठा रहा तो फिर उन्मादियों से कौन निपचता। इस वक्त तक सुबह का साढ़े ग्यारह बज चुका था। मस्जिद अब भी सुरक्षित खड़ी थी। तभी वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचा। उसने पहले से मौजूद कारसेवकों को कुछ समझाने की कोशिश की। जैसे वो किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे थे। कुछ ही देर में बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी वहां से बाहर निकलती नजर आई। न कोई विरोध न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह पुलिस की इस टुकड़ी को दूर मचान पर बैठे पुलिस अधिकारी सिर्फ देखते रहे कुछ किया नहीं। फिर भी ये सवाल उठता है कि क्या सिर्फ तथाकथित हिदुत्व ब्रिगेड के बस की बात थी ये विवादित ढांचा गिरा दिया जाता। क्या बिना सरकार के सहयोग के ये संभव था।

मस्जिद से पुलिस के हटने के तुरंत बाद मेन गेट पर दूसरा और बड़ा धावा बोला गया। जो कुछ पुलिसवाले वहां बचे रह गए थे वो भी पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए। दोपहर 12 बजे एक शंखनाद पूरे इलाके में गूंज उठा। कारसेवकों के नारों की आवाज पूरे इलाके में गूंजती जा रही थी। कारसेवकों का एक बड़ा जत्था मस्जिद की दीवार पर चढ़ने लगा बाड़े में लगे गेट का ताला भी तोड़ दिया गया कुछ ही देर में मस्जिद कारसेवकों के कब्जे में थी।

तत्कालीन एसएसपी डीबी राय पुलिसवालों को मुकाबला करने के लिए कह रहे थे लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। उस वक्त भी ये सवाल उठा था कि क्या ये पुलिस का विद्रोह था और ये सवाल आज भी मुंह बाए खड़ा है। क्या पुलिस भी चाहती थी कि विवादित ढांचा गिरा दिया जाए। क्या ये विद्रोह था उस मुस्लिम शासन के खिलाफ जो कि कई सालों तक मंदिरों को तोड़ कर लूटपाट कर अपनी खजाना भरते रहे। इस वक्त तक पुलिसवाले पूरी तरह हथियार डाल चुके थे। कुदाल लिए हुए कारसेवक तब तक मस्जिद गिराने का काम शुरु कर चुके थे। एक दिन पहले की गई रिहर्सल काम आई और कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को पूरी तरह ढहा दिया गया।

June 29, 2009

फिर सरेंडर का ढोंग, राज पहुंचे कोर्ट


मनसे के प्रमुख राज ठाकरे ने कल्याण कोर्ट में सरेंडर कर दिया है। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज ठाकरे ऐसा करने को मजबूर हुए हैं। साल 2008 के अक्टूबर में उत्तर भारत से रेलवे की परीक्षा देने आए छात्रों के साथ मारपीट हुई थी। ये मारपीट कल्याण इलाके में हुई थी। आरोप है कि राज ठाकरे के कहने पर एमएनएस के कार्यकर्ताओं ने उन्हें परीक्षा देने से रोका था और उनके साथ मारपीट की थी। हाई कोर्ट ने राज ठाकरे से सरेंडर करने को कहा था। अब देखना ये है कि कोर्ट से राज को जमानत मिलेगी या फिर उन्हें जेल जाना होगा।

भड़काऊ भाषण के मामले में राज ठाकरे का कोई सानी नहीं है। कभी मराठा छत्रप बाला साहब ठाकरे के दाहिने हाथ रहे राज ने जब शिवसेना छोड़ महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का गठन किया तो उन्हें भी अपनी जमीन बनाने के लिए अपने चाचा की तरह कुछ ऐसा करना था जिससे वो मराठियों का विश्वास हासिल कर सकें। हालिया लोकसभा चुनाव में वो कुछ हद तक सफल भी हो गए थे।

पिछली सुनवाई के समय बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज ठाकरे को आदेश दिया था कि उन्हें हर हाल में कल्याण रेलवे कोर्ट में 29 जून तक सरेंडर करना है। 24 अक्टूबर 2008 को कल्याण रेलवे स्टेशन पर एमएनएस कार्यकर्ताओं ने जमकर मारपीट की थी। आरोप है कि राज ठाकरे के इशारे पर रेलवे की परीक्षा देने आए उत्तर भारतीय छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया।

कल्याण कोर्ट में राज के खिलाफ 153बी, 153 सी और 412 के तहत कार्रवाई की गई। तीनों धाराएं गैरजमानती हैं। इसके बाद कल्याण पुलिस ने राज ठाकरे को गिरफ्तार किया और राज ठाकरे को एक दिन जेल में भी बिताना पड़ा। बाद में इसी मामले में राज ठाकरे को कल्याण की निचली अदालत से अंतरिम जमानत मिल गई। राज्य सरकार ने राज ठाकरे की अंतरिम जमानत को रद्द करने की अपील हाईकोर्ट में की थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने राज ठाकरे की अंतरिम जमानत रद्द करते हुए 29 जून तक सरेंडर करने का आदेश दिया।

राज ठाकरे के वकील के मुताबिक जैसे ही राज ठाकरे कोर्ट में सरेंडर करेंगे ठीक उसी वक्त उनकी जमानत की अर्जी भी दाखिल कर दी जाएगी। कल्याण कोर्ट में दायर मुकदमा तो राज ठाकरे के कारनामों का एक छोटा सा नमूना है। उनपर दायर मुकदमों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। ज्यादातर मामलों में भड़काऊ भाषण और माहौल खराब करने के आरोप है। अब देखना ये है कि क्या सरेंडर करने के बाद एक बार फिर राज ठाकरे जमानत हासिल करने में कामयाब हो जाएंगे।

June 25, 2009

पढ़ाई पर छूट के लिए केंद्र, यूपी सरकार में होड़



लगता है मुलायम सिंह का भूत अब सिर चढ़कर बोल रहा है। पहले कपिल सिब्बल और उसके बाद उनकी धुर विरोधी मायावती ने भी मुलायम तेवर दिखाते हुए छात्रों के लिए कुछ खास इंतजाम किए हैं। केंद्र सरकार 10वीं की बोर्ड परीक्षा से बच्चों को मुक्त करने के प्रति गंभीर है। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि वो भी इस हक में हैं कि स्कूली बच्चों को 10वीं की परीक्षा के खौफ और तनाव से मुक्त कर देना चाहिए। मानव संसाधन मंत्री ने यहां तक कह दिया कि हमें पूरे एजुकेशन सिस्टम पर फिर से विचार करने की जरूरत है। सिब्बल ने कहा है कि 10वीं की बोर्ड परीक्षा की बजाय नियमित अंतराल पर टेस्ट होना चाहिए। कपिल सिब्बल ने उम्मीद जताई कि अभिभावक और छात्र सरकार की इस पहल का स्वागत करेंगे। सिब्बल के मुताबिक 10वीं की परीक्षा छात्रों के साथ ही अभिभावकों के भी जी का जंजाल बन गई थी।

इससे पहले उच्च शिक्षा में सुधार के लिए बनाई गई यशपाल कमेटी ने भी कई बड़े बदलावों की जमीन तैयार कर दी है। कमेटी ने सिफारिश की है कि UGC जैसी संस्थाओं को खत्म करके एक राष्ट्रीय आयोग बनाया जाए जो उच्च शिक्षा से जुड़े सभी मामलों को देखे। सरकार ने सौ दिन के भीतर इन सिफारिशों पर अमल करने का वादा किया है।

उधर मायावती ने यूपी बोर्ड में दसवी के छात्रों को भी राहत का ऐलान किया है। इस व्यवस्था के अंतर्गत 10वीं तक के छात्रों को नंबर गेम से मुक्ति मिल गई है। अब दसवीं तक के बच्चों को केवल परीक्षा पास करनी होगी और इसके एवज में उन्हें ग्रेडिंग पद्धति से आंका जाएगा। ये व्यवस्था साल 2010 से लागू होगी।

June 24, 2009

बारिश ना हुई तो, क्या किसान देंगे लगान


मॉनसून में देरी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में सूखे का संकट मंडराने लगा है। बारिश ना होने से जमीन बंजर होने के कगार पर पहुंच गई है और किसानों के सामने सिंचाई का संकट पैदा हो गया है। अगर जल्दी ही बारिश नहीं हुई तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। गन्ने की फसल को पानी नहीं मिल रहा है तो ज्वार और मक्का की फसल पानी बिना बढ़ नहीं पा रही है। इतना ही नहीं पानी की कमी ने आम से उसकी मिठास भी छीन ली है।

बिहार में अबतक मॉनसून ने दस्तक नहीं दी और किसान परेशान हैं। खेत यूं दिख रहे हैं जैसे किसी ने इनमें आग लगा दी हो। बंजर खेतों में जहां थोड़ी बहुत फसल है तो उनमें अनाज के दाने नहीं। जाहिर है बिन पानी बिहार में भी सब सून है। वहीं मौसम विभाग की मानें तो अगले कुछ दिनों तक वारिश के कोई आसार भी नहीं। मानसुन के बादल रुठ गये है कड कडाती धुप से धरती का कलेजा फट रहा है बावजुद इसके बादलो का दिल पसीजते नही दिख रहा है और अगर कुछ दीन और यही हाल रहा तो एक-एक बुद पानी के लिये तरस रहे किसान टुट जायेंगे।

यूपी में भी हाल कोई जुदा नहीं। यहां के हरित बेल्ट पर भी सूखा मंडरा रहा है। मई-जून मिलाकर अब तक पश्चिमी
यूपी में सिर्फ 9 मिलीमीटर बारिश हुई है। पंजाब में धान की रोपाई शुरू हो चुकी है। लेकिन यहां सब ठप पड़ा है। अगर जून खत्म होते-होते बारिश नहीं हुई तो हरित बेल्ट को इस बार सूखे से कोई नहीं बचा पाएगा।

बारिश की कमी ने आम की रंगत बदल दी है। न वो महक है, न वो स्वाद। सहारनपुर में लाखों एकड़ में फैले आम के बाग में दशहरी और लंगड़ा सूखे की जद में हैं और इनका आकार बढ़ ही नहीं रहा।

मेरठ, मुरादाबाद और मुजफ्फरनगर के अलावा बुलंदशहर, बागपत और गौतमबुद्धनगर भी सूखे की चपेट में आने लगे हैं। यहां जमीन के नीचे पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है। कुल मिलाकार अब सारी उम्मीदें बारिश पर आकर टिक गई हैं। उत्तर भारत में पंजाब और हरियाणा के बाद पश्चिमी यूपी की आर्थिक रीढ़ खेती पर ही निर्भर है। अगर एक हफ्ते भर के भीतर बारिश नहीं हुई तो इस क्षेत्र में हाहाकार मच जाएगा।

वेस्ट की ये धरती सोना उलगने के लिए जानी जाती है लेकिन फिलहाल तो इसका सीना बारिश की एक बूंद के लिए तरह रहा है। तालाब सूख गए हैं, हैंड पंपों में पानी नहीं है और ट्यूबवैल के वाटर लेवल नीचे जाने से इस हरित प्रदेश को सूखा प्रदेश न घोषित करना पड़े।

एल नीनो का प्रभाव

वैज्ञानिकों का कहना है कि मॉनसून की रफ्तार को थामने के पीछे वजह है एल नीनो। एल नीनो मौसम का एक मिजाज है और जब ऐसे हालात बनते हैं तो दक्षिण एशिया में मॉनसून के हालात खराब हो जाते हैं। सूखे और अकाल की स्थिति बन जाती है।


एल नीनो मौसम का एक मिजाज है। इसके चलते प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है और ये दक्षिण अमेरिका से दक्षिण एशिया की तरफ बहने वाली हवाओं की रफ्तार धीमी कर देता है। इस वजह से मॉनसून की ताकत कमजोर पड़ जाती है और सूखे की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म होकर ऊपर उठता है तो यह अपने ऊपर से गुजरने वाली हवाओं को भी गर्म कर देता है। इसमें सूखी हवा ज्यादा होती है। मॉनसून की पानी बरसाने वाली नमी सूख जाती है और मॉनसून कमजोर पड़ जाता है। इसलिए एल नीनो बारिश का दुश्मन है। जिस साल वो आता है, भारत समेत दक्षिण एशिया के बड़े इलाके में सूखा, अकाल और तबाही लेकर आता है।

इससे पहले 2004 और 2002 में भारत में मॉनसून पर अल नीनो का असर पड़ा था। तब बारिश काफी कम हुई थी। जो आमतौर पर होने वाली बारिश से भी 10 फीसदी कम थी। इस साल भी मॉनसून का मूड अच्छा नहीं है। दक्षिण एशिया में एल नीनो की आशंका जताई जा रही है। और इसका मतलब होगा सूखा, अकाल, महंगाई, नाउम्मीदी और गरीबी।

सरबजीत को फांसी की सजा बरकरार

सरबजीत सिंह को आज पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा बरकरार रखी। इससे सरबजीत को काफी धक्का लगा है। भारत सरकार पिछले कई दिनों से सरबजीत को छुड़ाने के प्रसास कर रही थी। भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह जिन्हें मनजीत सिंह के रूप में भी जाना जाता है पाकिस्तान के कोट लखपत जेल में बंद है। उनके ऊपर 1990 में लाहौर और मुलतान में सिलसिलेवार बम धमाके करवाने का आरोप है। इन बम धमाकों में आधिकारिक तौर पर 14 लोगों की मौत हो गई थी। सरजीत का कहना है कि वो केवल एक किसान है। जो कि पाक सीमा के पास के गांव में रहता है। सरबजीत को उनके पहले के इकबालिया बयान के मद्देनजर एंटी टेररिस्ट कोर्ट मे 1991 को सजा-ए-मौत सुनाई गई थी। इस सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को कायम रखा। राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने मार्च 2006 को उनकी माफी की याचिका ठुकरा दी थी। पाकिस्तान ने सरबजात को फांसी की सजा को भारतीय अनुरोध के बावजूद बरकरार रखा गया है। सरबजीत को 29 अप्रैल 2008 को फांसी की सजा सुनाई गई थी। वो पिछले 18 साल से लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद है। आज जब पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट में सरबजीत की अर्जी खारिज हुई, तब सरबजीत के वकील अदालत में मौजूद नहीं थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हाजिर रहने को कहा था।

June 17, 2009

स्टेम सेल का वरदान, ठीक होगा डायबिटीज



अब आपके द्वारा ही होगा आपका इलाज

जी हां डायबिटीज के मरीजों के लिए ये बहुत बड़ी खबर है। ऐसे लोग जो डायबिटीज के शिकार हैं उनके पैरों में अक्सर घाव हो जाता हैं। इन घावों का भरना काफी मुश्किल होता है। नौबत पैर काटने तक की आ जाती है। मगर अब जल्दी ही स्टेम सेल थेरेपी के जरिए ऐसा इलाज शुरू होने वाला है जो मरीज को अपाहिज होने से बचा सकता है। और इसके लिए फोर्टिस अस्पताल को इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च से इजाजत भी मिल चुकी है।

6 महीने, सिर्फ 6 महीने और उसके बाद डायबिटीज के मरीजों को मिल सकता है नया जीवन। उनकी तकलीफों से मिल सकता है हमेशा के लिए छुटकारा। उनके इलाज के लिए भारत में पहली बार आ रही है एक नई तकनीक - स्टेम सेल थेरेपी। ये थेरेपी क्या है और ये कैसे डायबिटीज के मरीजों के लिए फायदेमंद होगी ये भी हम आपको बताएंगे। मगर पहले आपको बताते हैं वो हकीकत जिससे डियबिटीज के मरीज परेशान रहते हैं।

ऐसे मरीजों को एक खतरा हमेशा बना रहता है। और वो है पैरों में घाव यानि फुट अल्सर का। इसका इलाज आसान नहीं है। वजह साफ सी है कि डायबिटीज के मरीजों के घाव मुश्किल से भरते हैं क्योंकि उस हिस्से में रक्त संचार रुक जाता है। और अगर वो घाव पैर में हो जाए तो फिर मरीज का चलना फिरना भी दूभर हो जाता है। कभी कभी तो पैर काटने तक की नौबत आ जाती है।

मगर अब स्टेम सेल थेरेपी से डियबिटीज के मरीजों को जल्दी ही इस मुसीबत से छुट्कारा मिल सकता है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च यानि आईसीएमआर ने फोर्टिस अस्पताल को थेरेपी पर काम करने की इजाजत दे दी है। भारत में शुरुआती क्लीनिकल ट्रायल के लिए 36 मरीज़ों को चुना गया है। इन सभी मरीज़ों को डायबेटिक फुट अल्सर है। इनमें से 12 मरीज़ों का इलाज इस नई थेरेपी से किया जाएगा। बाकि मरीज़ों का इलाज पुराने तरीके यानि ऐन्टीबॉयोटिक और मरहम-पट्टी से किया जाएगा।

साथ-साथ किए जा रहे इस इलाज के दौरान पता लगाया जाएगा कि स्टेम सेल थेरेपी, इलाज के पुराने तरीके से कितनी ज़्यादा कारगर है। भारत को एक लंबे वक्त से ऐसी थेरेपी की जरूरत थी क्योंकि दुनिया भर के डियबिटीज मरीजों में से 4 करोड़ भारत में ही हैं। देखा जाए तो देश के हर तीसरे परिवार में डायबिटीज़ का कोई न कोई मरीज मिल जाएगा।

ये एक ऐसा मर्ज़ है जिसे रोका नहीं जा सकता। इसकी सीधी वजह है भागदौड़ भरी जिंदगी में खाने पीने का गिरता स्तर। बढ़ता तनाव, ज़्यादा वज़न, शराब और धूम्रपान की लत। और डायबेटीज़ आपके शरीर को अंदर से कमज़ोर बना देता है। बीमारी से लड़ने की आपकी शक्ति को धीरे-धीरे खत्म करता जाता है। ऐसे में अगर फुट अल्सर हो जाए तो मुसीबत दुगनी हो जाती है।

इस वक्त डॉक्टरों के पास मौजूद तकनीक के मुताबिक डायबिटिक फुट अल्सर का इलाज एन्टीबायोटिक और मरहम-पट्टी से किया जाता है। लेकिन इसमें 6 से 9 महीने तक का वक्त लग जाता है। कभी कभी तो हालात इतने खराब हो जाते हैं कि मरीजों को अपने पैर तक कटवाना पड़ता है। इसके अलावा ये इलाज काफी महंगा भी है - इसमें 2 से ढाई लाख रुपए का खर्च आता है। इतना सब होने का बाद भी डायबिटीज़ का मरीज ज़िन्दगी भर अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाता।

मगर अब इन सारी परेशानियों से मरीजों को घबराने की जरूरत नहीं है। स्टेम सेल थेरेपी के जरिए डायबिटिक फुट अल्सर के मरीज़ों को अपने पैर नहीं कटवाने पड़ेंगे। पूरे इलाज के बाद वो दोबारा अपने पैरों पर चल सकेंगे। डॉक्टरों की ये कोशिश अगर कामयाब हो गई तो डायबिटिज के मरीजों के चेहरे पर मुस्कुराहट फिट लौट आएगी।

कोरिया और जर्मनी में क्लीनिकल ट्रायल सफल रहे हैं... 6 महीने में भारत में आम जनता के लिए उपलब्ध हो जाएगी। अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर स्टेम सेल थेरेपी से फुट अल्सर का इलाज होगा कैसे। तो हम आपको बता दें कि इसमें मरीज के शरीर से ही स्टेम सेल को निकालने के बाद उससे दवा बनाई जाएगी। फिर उस दवा को इंजेक्शन की शक्ल में दोबारा मरीज के घाव वाले हिस्से में लगाया जाएगा। यानि डायबिटिक मरीज के शरीर में ही छुपा है उसकी तकलीफ का इलाज।

डायबिटिक मरीजों में पैरों के अल्सर के लिए स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल जल्दी ही शुरु होने वाला है। स्टेम सेल थेरेपी यानि विज्ञान का वो पहलू जिसने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी। ऐसा तरीका जिसमें किसी इंसान के मर्ज को ठीक करने के लिए उसके ही शरीर से दवा निकाली जाती है। अब आपके शरीर से ही स्वस्थ सेल निकालकर वापस आपके शरीर में डाले जाते हैं। इसी को स्टेम सेल थेरेपी कहा जाता है। ये थेरेपी के दौरान कुछ खास सेल्स का इस्तेमाल किया जाता है। इंसान के खून में मौजूद इन सेल्स को स्टेम सेल्स कहा जाता है।

भारत में डायबिटिक फुट अल्सर के मरीजों का इलाज करने के लिए अब स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले पहले मरीज़ के शरीर में मौजूद स्टेम सेल की मात्रा को बढ़ाना होगा। इसके लिए शरीर में खास Gmcfs नाम के 4 इंजेक्शन दिए जाएंगे। इन इंजेक्शन्स को देने पर स्टेम सेल की मात्रा बढ़ जाएगी। इसके बाद शरीर से खून निकाला जाएगा। फिर खून में से स्टेम सेल्स को बाकि सेल्स से अलग किया जाएगा। अलग किए गए इन स्टेम सेल्स को 50 छोटी-छोटी डोज़ बनाई जाएंगी। इन्हें अलग-अलग इंजेक्शन के माध्यम से पैर के उस हिस्से में डाला जाएगा, जहां अल्सर हुआ है।

इंजेक्शन लगाने की प्रक्रिया में दर्द होने की संभावना होने की वजह से मरीज़ को स्पाइनल एनेसथीसिया दिया जाएगा। इसके लिए मरीज़ को एक दिन के लिए अस्पताल में एडमिट भी होना होगा। स्टेम सेल पैर में पहुंचने के बाद धीरे-धीरे बढ़ना शुरू कर देंगे। स्वस्थ सेल्स की मात्रा बढ़ते ही पैर के अल्सर वाले हिस्से में रक्त का संचालन शुरू हो जाएगा। और जल्द ही मरीज़ का पैर ठीक हो जाएगा और वो चलने के काबिल हो जाएगा।

स्टेम सेल में दो खासियत हैं। पहली ये कि ये सेल रीजेनेरेट करते हैं। यानि खुद-ब-खुद बढ़ने या मल्टिप्लाई करने की क्षमता रखते हैं। और दूसरा ये कि ये सेल आसानी से किसी और सेल की शक्ल ले सकते हैं। यानि मर्ज़ जिस भी तरह के सेल में हो, स्टेम सेल - उसी सेल की स्वस्थ शक्ल ले सकते हैं।

स्टेम सेल यानि ऐसी ताकत जो इंसान के अपने शरीर में छुपी होती है। डॉक्टरों ने इसे पहचाना और अब ये दुनिया के सामने आ गई है। उसके बाद सामने आया फुट अल्सर का इलाज करने का तरीका। इसकी जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि डायबिटीज मरीजों में पैरों के घाव का वक्त पर इलाज न होने से शरीर के दूसरे हिस्सों में फैसले का खतरा बना रहता है जो बाद में गैंगरीन का रूप ले सकता है। मगर अब इलाज के लिए मरीजों को परेशान नहीं होना पड़ेगा।

मरीज के शरीर से ही दवा बनाकर उसका इलाज करने का ये तरीका वाकई कारगर साबित हो सकता है। बहरहाल सवाल ये है कि अगर शुगर के मरीजों के पैर के घाव इस तरीके से ठीक किए जा सकते हैं तो क्या स्टेम सेल की मदद से डायबिटीज को भी जड़ से खत्म किया जा सकता है। दुनिया भर के डॉक्टर भी इन दिनों इसी सवाल से जूझ रहे हैं।


स्टेम सेल थेरेपी से फुट अल्सर के इलाज के सवाल के साथ ही ये सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या डायबिटीज के शिकार मरीज के बाकी हिस्सों के घाव का भी इससे इलाज हो सकता है। और क्या डायबिटीज का पूरा इलाज भी इससे हो सकता है। दुनिया भर के डॉक्टर इस दिशा में काम भी कर रहे हैं। मगर अभी तक कोई कामयाबी हाथ नहीं लगी है। हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसी दर्दनाक हकीकत जो डियबिटीज के मरीजों का दर्द बयान करेगी।

हर साल डायबिटीज के 4 फीसदी मरीजों को पैरों में घाव हो जाते हैं। 45 से 75 फीसदी मामलों में डायबिटीक मरीजों के पैर काटने पड़ते हैं। दुनिया भर में 1 करोड़ डायबिटिक मरीजों के शरीर का कोई हिस्सा काटने की नौबत आ जाती है। 2030 तक भारत में तकरीबन 10 करोड़ डायबिटीज मरीजों को फुट अल्सर का खतरा होगा। फुट अल्सर के ऐसे मरीजों के लिए अगर स्टेम सेल थेरेपी कारगर साबित होती है तो वाकई ये विज्ञान की एक बड़ी जीत होगी। देश के करोड़ों डायबिटीज मरीजों के लिए ये वरदान साबित हो सकती है। वैसे विदेश में

इस वक्त में ल्यूकेमिया के लिए स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें स्टेम सेल के बोन मैरो ट्रान्सप्लांट के ज़रिए निकाला और वापस शरीर में डाला जाता है। आने वाले वक्त में वैज्ञानिक स्टेम सेल थेरेपी को कैंसर, पार्किनसन, और मल्टिपल सेरोसिस जैसी बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल में लाने पर काम कर रहे हैं।

भारत में फुट अल्सर के लिए स्टेम सेल थेरेपी की दिशा में 6 महीने में नई क्रांति आ सकती है। उसके बाद ये कोशिश भी हो सकती है कि स्टेम सेल से डायबिटीज का इलाज खोजा जाए। मुमकिन है कि आने वाले वक्त में ऐसा कोई तरीका आ जाए कि डायबिटीज को जड़ से खत्म किया जा सके।

अगर फायदा हो रहा है तो तो बवाल तो होना ही है। स्टेम सेल थेरेपी को लेकर दुनिया भर के देशों में काफी वक्त से बवाल मचा हुआ है। इंसान के शरीर से स्टेम सेल निकालने के तरीकों को लेकर तो अमेरिका में काफी विरोध प्रदर्शन भी हुआ नतीजा ये हुआ कि पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने तो ऐसी रिसर्च पर रोक लगा दी थी।

दुनिया भर में स्टेम सेल रिसर्च हमेशा से ही विवादों में घिरा रहा है। और विवाद की वजह है खुद स्टेम सेल। वही कोशिकाएं जिनमें किसी भी बीमारी का इलाज करने की ताकत है। ये बेशकीमती सेल जीने की आस छोड़ चुके लोगों को नई जिंदगी देते हैं। ये सेल सबसे ज़्यादा मात्रा में इंसानी भ्रूण यानि एम्ब्रियो में पाए जाते हैं।


यानि किसी महिला के गर्भ में पल रहे 4 से 5 दिन के बच्चे में। तकनीकी तौर पर इस 4-5 दिन के एम्ब्रियो को शिशु कहना गलत होगा। लेकिन ये भी सच है कि ये जीवन की शुरुआत है। यही भ्रूण 9 महीनों में मां के पोषण पर विकसित होकर एक नवजात शिशु की शक्ल लेता है। इस एम्ब्रियो से स्टेम सेल निकालने के दो तरीके हैं। पहला इस एम्ब्रियो को मारना और दूसरा इसका क्लोन बना लेना।

अमेरिका में जब वैज्ञानिकों ने पहले तरीके का इस्तेमाल कर इस थेरेपी में रिसर्च करनी शुरू की तो आम लोगों का गुस्सा भड़क गया। कहा गया कि उन्हें मां के गर्भ में 4 से 5 दिन के भ्रूण को मारना अपराध है।

विरोध इतना उग्र हुआ कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अपने कार्यकाल के दौरान साल 2001 से 2006 तक स्टेम सेल रिसर्च के लिए सरकारी फन्डिंग बंद कर दी। साथ ही इंसानों पर इसके प्रयोग या क्लीनिकल ट्रायल पर भी पाबंदी लगा दी। लेकिन सत्ता बदली और 9 मार्च 2009 को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने स्टेम सेल रिसर्च को सरकारी मदद का ऐलान कर दिया।

स्टेम सेल निकालने का दूसरा तरीका है एम्ब्रियो को मारे बगैर उसका क्लोन बना लेना। लेकिन इस तकनीक के गलत इस्तेमाल की बहुत गुंजाइश होने की वजह से इस पर सभी देशों में पाबंदी है। यानि इस सेल की ये शक्ति ही इसके गलत इस्तेमाल की वजह बन सकती है। इसी वजह से भारत में एम्ब्रियो से स्टेम सेल निकालकर रिसर्च करने की इजाजत जरूर है मगर इसके लिए कड़े नियम बनाए गए हैं।


भारत और अमेरिका के अलावा फिलहाल ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, इजरायल, बेल्जियम, फिनलैंड, ग्रीस, निदरलैंड्स, स्वीडन और युनाइटिड किंगडम में एम्ब्रियो से स्टेम सेल निकालकर रिसर्च करने की इजाजत है। वहीं ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नॉर्वे, पोलैंड और आयरलैंड इसके सख्त खिलाफ हैं। इतने विवाद के बावजूद इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि स्टेम सेल में जो शक्ति है वो किसी और सेल में नहीं। और ऐसे में इलाज के इस बेहतरीन तरीके को इस्तेमाल में ना ला पाना पूरी दुनिया के लिए एक बहुत नुकसानदायक साबित होगा। तमाम मुश्किलों के बीच स्टेमल सेल की ताकत का इस्तेमाल करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक हल तलाशा। अब दुनिया भर के वैज्ञानिक अडल्ट स्टेम सेल के ज़रिए ही इस थेरेपी से अलग-अलग बीमारियों का इलाज ढूंढ रहे हैं। डायबिटिक फुट अल्सर का इलाज भी इन्हीं अडल्ट स्टेम सेल की मदद से किया जाएगा।

June 16, 2009

Sarv Shiksha Abhiyaan struggling in Varanasi....


Banaras…the city of burning ghats, temples, handicrafts and desi cuisines. Apart from this identity Varanasi holds another distinct separate identity. As said by the founder of Banaras Hindu University, late Pt. Madan Mohan Malviya, Varanasi is, “sarv vidya ki rajdhani”, i.e. the capital of education. Banaras Hindu University was formed with a view to develop education not only in the region but also in the country.

Speaking of education, hundred years after the inception of this university, not much has changed in the region. Just a few kilometres away from this magnificent university are a couple of primary and middle high government schools in the villages of Tikri and Tarapur. These schools are struggling with the minimum infrastructure that the government has provided. Some changes to the extent of expansion of classrooms and newly painted walls have come but they are not significant.

These schools lack basic infrastructure like electricity, books, teachers, uniform and even classrooms. In this digital age where France has declared access to internet to be the birth right of every citizen, our country fails to provide even books.

Local constraints are also hampering the development of these schools. Midday meals provided here is as everywhere, not up to the edible standards. Even newly constructed rooms for the schools are used by the principals to store their household scraps. To my surprise, the principal of Tarapur primary school had put a lock on the newly build toilet especially for the girl students. On enquiring the reason, the school principal says, “students make it dirty, so we keep it locked”.

Education system has to develop in India atleast to secure its future, but for development both the sides of the coin i.e., the government and society have to work together, failing which India fails as a nation.


BY TUSHAR

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