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Varanasi, UP, India
Working with an MNC called Network 18, some call it news channel(IBN7), but i call it दफ्तर, journalist by heart and soul, and i question everything..

September 18, 2010

अयोध्या विवाद का घटनाक्रम

हिन्दू और मुस्लिमों के बीच तनाव की अहम वजह है हिंदुओं का दावा जिसमें कहा जा रहा है कि यह स्थान भगवान श्रीराम की जन्म भूमि है,वहीं मुसलमानों का कहना है कि इसी स्थान पर बाबरी मस्जिद थी।

भगवान श्रीराम हिंदुओं के आराध्यदेव हैं। अयोध्या उनकी जन्मभूमि है। अयोध्या का विवाद, रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के दावे के बीच घूम रहा है। इस अहम मुद्दे से देश की राजनीति एक लंबे अरसे से प्रभावित हुई है। मामले-मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं।

कोर्ट में पिछले छह दशकों से इस बात का मुकदमा चल रहा है कि राम मंदिर या बाबरी मस्जिद का मालिकाना हक किसका है। वह हिन्दू का है या मुस्लिम समुदाय का है। तमाम दावे पेश किए गए, तमाम जिरह हुई।
अपने दावे के पक्ष में हिंदुओं ने 54 और मुस्लिम पक्ष ने 34 गवाह पेश किए। इनमे धार्मिक विद्वान, इतिहासकार और पुरातत्व जानकार शामिल हैं।

एक ताजुब्ब भी है मुस्लिम पक्ष ने अपने समर्थन में 12 हिंदुओं को भी गवाह के तौर पर पेश किया। दोनों पक्षों ने लगभग 15 हज़ार पेज दस्तावेज़ी सबूत पेश किए। कई पुस्तकें भी अदालत में पेश की गईं।
फैसले की घड़ी अब नजदीक आ गई है। 24 सितम्बर का दिन मुकरर्र हुआ है देश के भाग्य का। कौन जीतेगा, कौन हारेगा। दिल थामे बैठे है हमारे हिन्दू और मुस्लिम भाई।

इस इतिहास की बानगी पर एक नज़र...

24 सितम्बर 2010: मालिकाना हक पर फैसला दिया जाएगा।
जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी।
मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में ख़ारिज।
24 नवंबर, 2009: संसद के दोनों सदनों में लिब्रहान आयोग की रपट पेश। अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया। नरसिंह राव को साफ-साफ बचा लिया।
7 जुलाई, 2009: उत्तरप्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फाइलें सचिवालय से गायब हो गई हैं।
30 जून 2009: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 17 वर्षों के बाद लिब्रहान आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग का गठन बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की जांच के लिए गठित किया गया था।
19 मार्च 2007: राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे में कहा कि अगर नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती।
जुलाई 2006: सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ़ काँच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव किया।
28 जुलाई 2005: लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरूवार को रायबरेली की अदालत में पेश हुए।अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ आरोप तय किए।
जनवरी 2005: लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या मामले में अदालत में तलब किया गया।
जुलाई 2004: शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सुझाव दिया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मंगल पांडे के नाम पर कोई राष्ट्रीय स्मारक बना दिया जाए।
अप्रैल 2004: आडवाणी ने अयोध्या में अस्थायी राममंदिर में पूजा की और कहा कि मंदिर का निर्माण ज़रूर किया जाएगा।
अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए।
जून 2003: कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई लेकिन कुछ नहीं हुआ।
मई 2003: 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ सीबीआई ने पूरक आरोपपत्र दाखिल किए।
अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कहा गया है कि उसमें मंदिर से मिलते जुलते अवशेष मिले हैं।
मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया।
जनवरी 2003: विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर की हकीकत पता लगाने के लिए रेडियो तरंगों का प्रयोग किया गया। पर कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला।
22 जून, 2002: विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की माँग उठाई।
13 मार्च, 2002: सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर अपना निर्णय देते हुए कहाकि यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी। शिलापूजन नहीं होगी।
जनवरी 2002: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए अयोध्या समिति का गठन की।
2001: राम मंदिर निर्माण जरूर बनाएंगे। विश्व हिंदू परिषद ने इस संकल्प को एक बार फिर दोहराया।
1998: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने गठबंधन सरकार बनाई।
1992: 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। इसमें विहिप, भाजपा व शिव सेना के कार्यकर्ता शामिल थे। सांप्रदायिक दंगे हुए। 2000 से अधिक लोग मारे गए।
1990: बाबरी मस्जिद को विहिप ने नुकसान पहुंचाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने विवाद सुलझाने के प्रयास किए।
1989: विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी।
1986: बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन। फैजाबाद सेशन कोर्ट ने विवादित मस्जिद के दरवाज़े पर से ताला खोलने का आदेश दिया। मुसलमानों ने विरोध किया।
1984: विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में एक समिति का गठन। जिसका मुख्य उद्देश्य राम जन्मभूमि को मुक्त करना था। बाद में इस अभियान की जिम्मेदारी भाजपा के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी पास आ गईं।
1949: दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर किया। सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर दिया और ताला लगा दिया।
1859: इस विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन शासक ने विवादित जगह को चारों तरफ से घेर दिया। अब मुसलमान विवादित परिसर के भीतर इबादत और हिन्दू बाहर प्रार्थना करने लगे।
1853: यह वह वर्ष था जब अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद का मुद्दा बना। और पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए।
1528: हिन्दूओं के आराध्य देवता भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर मस्जिद बनवाई गई। बताया जाता है कि इसे मुग़ल सम्राट बाबर ने बनवाया था

August 28, 2010

अकबर इलाहाबादी के चंद नज्मों पर गौर फरमाएं

अफ़्सोस है

अफ़्सोस है गुल्शन ख़िज़ाँ लूट रही है
शाख़े-गुले-तर सूख के अब टूट रही है

इस क़ौम से वह आदते-देरीनये-ताअत
बिलकुल नहीं छूटी है मगर छूट रही है


आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे
आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे

शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं
झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे

रोज़े-रिन्दी है नसीबे-दीगराँ
शायरी की सिर्फ़ क़ूवत है मुझे

नग़मये-योरप से मैं वाक़िफ़ नहीं
देस ही की याद है बस गत मुझे

दे दिया मैंने बिलाशर्त उन को दिल
मिल रहेगी कुछ न कुछ क़ीमत मुझे

अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माअ़ने
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते

आबे ज़मज़म से कहा मैंने

आबे ज़मज़म से कहा मैंने मिला गंगा से क्यों
क्यों तेरी तीनत में इतनी नातवानी आ गई?

वह लगा कहने कि हज़रत! आप देखें तो ज़रा
बन्द था शीशी में, अब मुझमें रवानी आ गई

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी
निकलती हैं दुआऐं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर

तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था
मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर

न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे
मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर

हक़ीक़त में मैं एक बुलबुल हूँ मगर चारे की ख़्वाहिश में
बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर

निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनूं है
सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर

उससे तो इस सदी में

उससे तो इस सदी में नहीं हम को कुछ ग़रज़
सुक़रात बोले क्या और अरस्तू ने क्या कहा

बहरे ख़ुदा ज़नाब यह दें हम को इत्तेला
साहब का क्या जवाब था, बाबू ने क्या कहा


एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़

एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
इक ज़रूरत से जाता था बाज़ार
ज़ोफ-ए-पीरी से खम हुई थी कमर
राह बेचारा चलता था रुक कर
चन्द लड़कों को उस पे आई हँसी
क़द पे फबती कमान की सूझी
कहा इक लड़के ने ये उससे कि बोल
तूने कितने में ली कमान ये मोल
पीर मर्द-ए-लतीफ़-ओ-दानिश मन्द
हँस के कहने लगा कि ए फ़रज़न्द
पहुँचोगे मेरी उम्र को जिस आन
मुफ़्त में मिल जाएगी तुम्हें ये कमान

August 10, 2010

इन्तिसाब

आज के नाम
और
आज के ग़म के नाम
आज का ग़म के: है ज़िन्दगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा
ज़र्द पत्तों का बन
ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है
दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है
किलर्कों की अफ़सुर्दा जानों के नाम
किर्मख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम
पोस्टमैनों के नाम
ताँगेवालों के नाम
रेलवानों के नाम
कारख़ानों के भोले जियालों के नाम
बादशाहे-जहाँ, वालिए-मासिवा, नायबुल्लाहे-फ़िल-अर्ज़,
दहक़ाँ के नाम
जिसके ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए
जिसकी बेटी को डाकू उठा ले गए
हाथ-भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है---फैज अहमद फैज
इक यही सोज़े-ए-निहाँ कुल मिरा सरमाया है !
दोस्तो ! मैं किसे यह सोज़-ए-निहाँ नज़्र करूँ ? !
...किसको दिल नज़्र करूँ और किसे जाँ नज़्र करूँ !
...अपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहीं !
दस्तो-बाज़ू मेरे नाकारा हुए जाते हैं !
जिनसे हर दौर में चमकी है तुम्हारी देहलीज़,
आज सिज्दे वही आवारा हुए जाते हैं !
राह में टूट गये पाँव तो मालूम हुआ
जुज़ मिटे और मेरा रहनुमा कोई नहीं !
एक के बाद ख़ुदा एक चला आता था :
कह दिया अक़्ल ने तंग आके-ख़ुदा कोई नहीं !
जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को,
सौ चिराग़ अँधेरे में झिलमिलाने लगते हैं !

लमहे भर को यह दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है !
लम्हे भर को सब पत्थर मुस्कराने लगते हैं !

जिन्दगी चलती रही काँटों पर अंगारों पर !
तब मिली इतनी हसीं इतनी सुबुक चाल तुझे !

दिल में फिर दर्द उठा

दिल में फिर दर्द उठा
फिर कोई भूली हुई याद
छेड़ती आई पुरानी बात
दिल को डंसने लगी गुज़री हुई जालीम रात
दिल में फिर दर्द उठा
फिर कोई भूली हुई याद बन के नश्तर
रंगे अहसास में उतरी ऐसे
मौत ने ले के मेरा नाम पुकारा जैसे--- मीना कुमारी

April 26, 2010

तीन रविवार की दास्तान

11 अप्रैल - पहला रविवार
एक ट्विट ने लगाई आग
18 अप्रैल - दूसरा रविवार
एक केंद्रीय मंत्री की चढ़ गई बलि
25 अप्रैल - तीसरा रविवार
आईपीएल कमिश्नर किए गए निलंबित
आईपीएल का जो महासंग्राम
पिछले तीन साल में नहीं हुआ
बस तीन रविवार के भीतर ही निपट गया
क्रिकेट की इससे बड़ी स्क्रिप्ट कभी नहीं लिखी गई
क्रिकेट में इतना बड़ा भूचाल कभी नहीं आया
रातों रात बदल गई सत्ता
मोदी पल में तोला तो पल में नजर आए माशा
डीवाई पाटिल स्टेडियम के भीतर आईपीएल के शंहशाह
तो स्टेडियम से बाहर निकलते ही बीसीसीआई के गुनहगार

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