सवा अरब हिंदुस्तानियों के बीच में कांटों की तरह उगा हुआ सच
बिहार की वो खबर से जो मानवता के नाम पर कलंक है। यहां एक लड़की को सरेआम अधनंगा कर दिया गया। लोग देखते रहे। अभी तक इस मामले में कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आश्रवासन दिए जा रहे हैं। बिहार विधानसभा में आज जमकर बवाल हुआ। सिर्फ लोगों को सस्पेंड किया गया।
देश का ये शर्म पूरी दुनिया ने देखा। हिंदुस्तान की सड़क पर सैकड़ों हजारों लोगों के सामने एक महिला का चीर हरण हुआ। लोग नपुंसक बन गए।
ऐसी शर्मनाक घटना जिसकी कल्पना भी रूह कंपा दे। ऐसी घिनौनी हरकत जिस देखकर इंसान होने पर शर्म आए। ऐसी विकृत मानसिकता जिस पर उबकाई आए। लेकिन इस शर्म से सिर्फ पटना, बिहार ही नहीं पूरा देश रुबरु हुआ। भीड़ एक महिला का तमाशा बनाती रही। एक सनकी महिला के कपड़े खींचता रहा। तबतक जबतक वो अधनंगी नहीं हो गई। लेकिन तमाशा चलता रहा। चलता रहा। न पुलिस, न समाज के ठेकेदार, न आम लोग। किसी की आत्मा नहीं कलपी। इस महिला को बचाने के लिए कोई कृष्ण नहीं आया। और अब जबकि ये मामला पूरे देश के सामने आ गया है इस पर कार्रवाई शुरु हो चुकी है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस पूरे मामले की रिपोर्ट मांग ली है। राज्य महिला आयोग भी अब तेजी दिखाने लगी। जबकि इलाके के थाने के एक एएसआई को निलंबित किया जा चुका है। महिला के साथ बदसलूकी करने वाले लड़के को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन इन लोगों का क्या होगा। जो इस पूरे मौके का फायदा उठा रहे थे। पुलिस ने भीड़ में मौजूद कई हैवानों को न तो अभी तक हिरासत में लिया है और नही गिरफ्तार किया है। लेकिन मुंख्यमंत्री नीतीश कुमार दावा कर रहे हैं कि कार्रवाई हो रही है।
तो क्या केवल पुलिस वालों को सस्पेंड कर देना ही कार्रवाई है। आखिर भीड़ में शामिल लोगों पर अभी तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। इतने देर तक ये तमाशा चलता रहा तो उसकी गाज सिर्फ एक पुलिस वाले पर क्यों गिरी। क्या कानून व्यस्था की जिम्मेदारी पूरे थाने पर नहीं है। बहरहाल अब विपक्ष में भी इस मुद्दे पर अपने हाथ आजमाने शुरु कर दिया है। विपक्षी नेताओं ने बिहार विधान सभा और विहार विधान परिषद के बाहर जमकर हंगामा किया। खास तौर से महिलाओं ने अपना जोरदार विरोध दर्ज करवाया।
इस शर्मनाक घटना ने बिहार में गुस्से की लहर दौड़ा दी है। आरजेडी के कार्यकर्ताओं ने भी अपना गुस्सा जाहिर किया। हैरानी की बात। सैकड़ों हजारों लोगों के सामने ये वाकया हुआ। लेकिन उस वक्त कोई नजर नहीं आया। सब तमाशबीन बने रहे। लेकिन अब इसपर राजनीति की रोटियां सेकने में मशगूल हैं। इन सब के बीच उस लड़की का हाल चाल जानने तक कोई नहीं पहुंचा। नहीं किसी घावों पर मरहम लगाने की कोशिश की। ये बिहार की ही नहीं देश के कई हिस्सों की सच्चाई है। बिहार में तो ये सच्चाई सिर्फ अधनंगी हुई। जिसे लोगों ने कुछ देर के मनोरंजन का साधन बना लिया।
अत्याचार का ये तमाशा रुका नहीं, गुरुवार को जो हुआ वो सबने देखा। पटना में आज फिर एक शर्मनाक घटना घटी। फर्क सिर्फ इतना था कि पिटने वाली बदल गई थी, अबकी बार बारी थी एक बुजुर्ग महिला की। पीटने वाले भी पुरुष नहीं बल्कि महिलाएं थीं। इस बार भी पुलिस की नाकामी साफ नजर आई। जब महिला की पिटाई हो रही थी तो उस वक्त मीडिया तो वहां थी लेकिन पुलिस नहीं थी।
पटना एक शर्म से उबरा भी नहीं था। कि उसे दूसरे शर्म ने घेर लिया। पहले सरेआम एक लड़की का चीरहरण कर पुरुषों ने इंसानियत को हरा कर जीत हासिल की। फिर भला महिलाएं भी क्यों पीछे रहे। देखिए किस उम्र की महिला पर सरेआम वो अपना हाथ आजमा रही है।
हैरत और शर्म से भरी हुई ये महिला पिटती जा रही है। लोगों ने इस परे आरोप लगाया है कि इसने मंदिर से चोरी की है।
ये महिला मंदिर के एक पास के एक मुहल्ले में रहने वाली है। हैरत की बात है महिला के पिटते वक्त मीडिया पहुंच गई लेकिन पुलिस वहां नहीं पहुंची। इस महिला की सरेआम बेइज्जती। पटना को शर्मसार करने वाली एक और घटना।
आखिर क्या कहेंगे इसे आप। अगर इस महिला ने चोरी की है तो उसे कानून के हवाले करना चाहिए। या फिर खुद अपने हाथों से ही उसे इंसाफ देने लग जाना चाहिए। जो नजर आ रहा है क्या वही है समाज। क्या यही है सभ्यता।
आप ही बताइये नीतीश जी। आप के सुशासन में ये क्या हो रहा है। मीडिया पहुंच जाती है लेकिन पुलिस वाले नहीं पहुंचते। आखिर क्यों। क्या आप के राज में महिलाओं के साथ ऐसा ही व्यवहार होता रहेगा।
मुख्यमंत्री से जब इस बारे में बात की की गई तो वो भी वही रटेरटाए बयान दे पल्ला झाड़ लिया। नीतीश कुमार का कहना था कि दोषियों को बक्शा नहीं जाएगा, स्पीडी ट्रायल के माध्यम से जल्द से जल्द कारवायी होगी।
लेकिन असलियत तो ये है कि लोगों को पुलिस और कानून पर कोई भरोसा ही नहीं रह गया है। इसलिए उन्हें कानून अपने हाथ में लेने में मजा आने लगा है। इसलिए पहले जरुरत है कि पहले पुलिस और कानून में लोगों का भरोसा बढ़ाना होगा। लोगों में पुलिस और कानून का डर जताना होगा। तब कहीं जाकर ऐसी घटनाएं रुकेंगी। नहीं तो ये होता रहेगा। और बयानों का दौर चलता रहेगा। स्पीडी ट्रायल के माध्यम से कुछ चंद लोगो को सजा दिलाकर बिहार के मुख्यमंत्री भले ही अपना पीठ खुब थप-थपाये मगर हकिकत तो यह है कि जंगल राज में सभी राजा बन बैठे हैं। लगता है फिल्म गंगाजल का असर लोगों पर ज्यादा हो रहा है। पुलिस प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे और लोग ही न्याय करते रहे।
July 24, 2009
हम ये नहीं कबूलते कि
ये हिंदुस्तान सवा अरब लोगों का मुल्क है लेकिन यहां इंसान सच का सामना करने से कतराता है
हम ये नहीं कबूलते कि
हमारे यहां सड़ी गली परंपराएं आज भी जिंदा हैं - आज भी सड़क पर हजारों लोगों के सामने एक महिला का चीरहरण हो जाता है और तमाशा देखते इंसान नपुंसक बने रहने में अपनी भलाई समझते हैं।
हम ये नहीं कबूलते कि
सड़क पर आज भी उन्माद में डूबी भीड़ के सामने दादी की उम्र की एक महिला को थप्पड़ जड़े जाते हैं - भीड़ देखती है और पिटाई के लिए और उकसाती है -
हम ये क्यों नहीं कबूलते कि
आज भी कौड़ियों के मोल खाकी वर्दी का ईमान बिक जाता है - वो जिस इंसान की सुरक्षा के लिए थी उसके सामने उसी इंसान की पीट पीट कर हत्या कर दी जाती है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने प्यार किया
इसे कबूलने के लिए जिगर चाहिए
कि समाज के नियमों को तोड़ने की सजा आज भी मौत है, समाज के अहंकार को ललकारने वाले बेटे को बचाने के लिए उसकी मां मौत से टकरा जाती है, अपने बेटे की ओर चलाई गई गोली वो अपने सीने पर खाकर मर जाती है
क्या हम इस सच का सामने करेंगे
कि आज भी इस मुल्क में मोहब्बत गुनाह समझी जाती है और अगर मोहब्बत करने वाले कानून की शरण में जाते हैं तो उनका गुनाह और भी बढ़ जाता है - भगवा गुंडों के आगे सब गूंगे बहरे बन जाते हैं
इस जंगलराज के आगे सब बेबस क्यों बन जाते हैं
जहां बेहूदी परंपराएं नासूर की तरह सड़ती गलती रहती हैं और हम उन्हें धर्म की तरह आंख मूंद कर सिर्फ और सिर्फ निभाते रहते हैं - इंसानी रिश्तों को गले का फंदा बना कर डाल दिया जाता है और प्रेमी जोड़े का सिर मूंड दिया जाता है
ये मायानगरी ही है जहां
भरोसे का बलात्कार होता है, कैमरे पर कैद होता है एक खौफनाक सच -
हम क्यों नहीं कबूल लेते कि इंसानों के बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इंसान कहलाने लायक नहीं, वो भेड़िये हैं - जो सिर्फ नोचना जानते हैं
यही है सच - सवा अरब हिंदुस्तानियों के बीच में कांटों की तरह उगा हुआ सच
हम ये नहीं कबूलते कि
हमारे यहां सड़ी गली परंपराएं आज भी जिंदा हैं - आज भी सड़क पर हजारों लोगों के सामने एक महिला का चीरहरण हो जाता है और तमाशा देखते इंसान नपुंसक बने रहने में अपनी भलाई समझते हैं।
हम ये नहीं कबूलते कि
सड़क पर आज भी उन्माद में डूबी भीड़ के सामने दादी की उम्र की एक महिला को थप्पड़ जड़े जाते हैं - भीड़ देखती है और पिटाई के लिए और उकसाती है -
हम ये क्यों नहीं कबूलते कि
आज भी कौड़ियों के मोल खाकी वर्दी का ईमान बिक जाता है - वो जिस इंसान की सुरक्षा के लिए थी उसके सामने उसी इंसान की पीट पीट कर हत्या कर दी जाती है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने प्यार किया
इसे कबूलने के लिए जिगर चाहिए
कि समाज के नियमों को तोड़ने की सजा आज भी मौत है, समाज के अहंकार को ललकारने वाले बेटे को बचाने के लिए उसकी मां मौत से टकरा जाती है, अपने बेटे की ओर चलाई गई गोली वो अपने सीने पर खाकर मर जाती है
क्या हम इस सच का सामने करेंगे
कि आज भी इस मुल्क में मोहब्बत गुनाह समझी जाती है और अगर मोहब्बत करने वाले कानून की शरण में जाते हैं तो उनका गुनाह और भी बढ़ जाता है - भगवा गुंडों के आगे सब गूंगे बहरे बन जाते हैं
इस जंगलराज के आगे सब बेबस क्यों बन जाते हैं
जहां बेहूदी परंपराएं नासूर की तरह सड़ती गलती रहती हैं और हम उन्हें धर्म की तरह आंख मूंद कर सिर्फ और सिर्फ निभाते रहते हैं - इंसानी रिश्तों को गले का फंदा बना कर डाल दिया जाता है और प्रेमी जोड़े का सिर मूंड दिया जाता है
ये मायानगरी ही है जहां
भरोसे का बलात्कार होता है, कैमरे पर कैद होता है एक खौफनाक सच -
हम क्यों नहीं कबूल लेते कि इंसानों के बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इंसान कहलाने लायक नहीं, वो भेड़िये हैं - जो सिर्फ नोचना जानते हैं
यही है सच - सवा अरब हिंदुस्तानियों के बीच में कांटों की तरह उगा हुआ सच
July 20, 2009
कसाब आखिर कबूला अपना जुर्म
26 नवंबर 2009 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के आरोपी आमिर अजमल कसाब ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। कसाब ने स्पेशल कोर्ट में हमले की पूरी कहानी सुनाई। उसने सिलसिलेवार तरीके से पाकिस्तानी साजिश का खुलासा किया। उसने बताया कि किस तरह वो कराची से मुंबई समंदर के रास्ते आया। मुंबई आने के बाद कसाब ने किस तरह खून-खराबा किया। इसके बारे में कसाब ने कोर्ट को विस्तार से बताया। कसाब ने माना कि कामा अस्पताल में उसने बेकसूर लोगों का खून बहाया। मुख्य आरोपी अजमल कसाब ने अदालत को बताया कि किस तरह वो कराची से बोट से अपने नौ साथियों के साथ मुंबई पहुंचा था। उसने अदालत को बताया कि वो कामा अस्पताल और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हुए हमले में शामिल था। कसाब ने अपने साथियों में अबू हमजा और लखवी का नाम भी बताया। कोर्ट ने कसाब का बयान दर्ज कर लिया है।
सरकारी वकील उज्जवल निकम ने बताया कि वो काफी वक्त से कोशिश कर रहे थे, और आखिर कसाब ने अपना गुनाह कबूल कर ही लिया। सरकारी वकील ने ये भी बताया 9 बड़े आतंकियों के नाम भी लिए। उसने हमले के मास्टरमाइंड लखवी और हाफिज सईद का भी नाम लिया। विशेष सरकारी वकील ने ये भी बताया कि कसाब कितना शातिर है, और वो जितनी जल्दी दूसरी भाषाओं को सीख लेता है, वो हैरान करने वाला है। हिन्दी, अंग्रेजी और उर्द जानने वाला कसाब बहस के दौरान मराठी भी सीख चुका है।
कसाब बेहद शातिर है। कसाब ने पहली बार मुंबई पर हमले मामले में अपना गुनाह नहीं कबूला है। इससे पहले भी कसाब गुनाह कबूल कर चुका है। मुंबई पुलिस के सामने कसाब ने अपनी करतूतों को विस्तार से बताया था। कोर्ट में सच्चाई बयां करने से पहले ही कसाब ने जांच एजेंसियों के सामने पहली बार क्या खुलासा किया था। कोर्ट में कसाब के कबूलनामे से कई सनसनीखेज खुलासे हुए। सरकारी वकील ने कोर्ट को कसाब का 23 पेज का कबूलनामा सुनाया।
और इस कबूलनामे से एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ। कसाब के कबूलनामे के मुताबकि पाकिस्तान सेना का एक मेजरजनरल दो बार उसके कैंप में आया। उसके यानि लश्कर ऐ तैयबा के कैंप में। यही नहीं कसाब के कबूलनामे के मुताबिक इस मेजर जनरल ने मुंबई के मिशन पर निकलने वाले सभी दस आतंकियों की परीक्षा भी ली। उनसे उनके लक्ष्यों यानि कहां कहां हमला करना है इसके बारे में जानकारी मांगी। मुंबई के लोकेशन के बारे में। इस परीक्षा मे पास होने के बाद ही उन्हें मुंबई की तरफ भेजा गया।
आतंकी संगठन में शामिल होने से पहले कसाब की अपने पिता से बात हुई। या यूं कहें कि पिता ने ही उसे संगठन में शामिल कराया। इस मौके पर क्या क्या कहा कसाब से उसके पिता ने... क्या क्या सिखाया उसे। कैसे कसाब को ले गया वो लश्कर के दफ्तर में। कसाब ने ये सब खुलासा जांच एजेंसी के सामने किया था।
कसाब ने जो गुनाह किया है वो अजीम है। वो इंसानियत का दुश्मन है। महज चौथी तक पढ़े कसाब ने अपने पहले कबूलनामे में सबकुछ बताया है। उसने बताया कि उसके दो और भाई है। दो बहने हैं। मां का नाम नूर इलाही है। बड़े भाई की अफजल की शादी हो चुकी है। अफजल की शादी साफिया नाम की लड़की से हुई। उन्हें एक बेटा और एक बेटी है। लेकिन पैसे को लेकर कसाब के भाई और भाभी में झगड़ा हो गया। वो अलग रहने लगी। कसाब ने भी बड़े भाई के यहां जाना बंद कर दिया. क्योंकि पैसे को लेकर उसे भी खरी खोटी सुननी पड़ती थी। कसाब के पिता की कमाई पहले से ही कम थी। कसाब की माने तो पूरा मुद्दा सिर्फ और सिर्फ गरीबी का था। यही गरीबी ही थी जो उसे लश्कर तक ले गई। पिता ने उसकी उंगली पकड़ी। और उसे ले गए लश्कर के दफ्तर तक।
पुलिस और कसाब के बीच हुई वार्तालाप कुछ इस तरह से थी।
पुलिस- स्कूल कब छोड़ा तुमने
कसाब- 2000 में छोड़ा
पुलिस- उसके बाद क्या किया।
कसाब-- मजदूरी, पहले गांव में किया, फिर वहां से निकल गया।
पुलिस- मजदूरी यानि क्या क्या करता था
कसाब- मिस्त्री के साथ, रेती वगैरह, सीमेंट वगैरह
पुलिस- यानि बिल्डिंग का काम करता था
कसाब-- उसके बाद लाहौर चला आया।
पुलिस- कितने साल रहा उधर
कसाब-- उधर काफी देर रहा हूं, तकरीबन पांच साल
पुलिस-- पांच साल? यानि 2005 तक वहां रहता था?
कसाब-- हां तकरीबन, अभी फिर भी आता जाता था
पुलिस-- और 2005 के बाद
कसाब-- उसके बाद बस वही, कभी गांव में, कभी किधर, मजदूरी कोई ठीन नहीं मिल रही थी। काफी देर गुजर गया, फिर इनसे राब्ता करवाया बाप ने।
पुलिस- कैसा कैसा
कसाब--- बाप ने कहा था न, देख बेटा हम बहुत गरीब हैं। फलाह हैं। उसी ने उनसे मुलाकात करवाई, दफ्तर वालों से। दफ्तर वालों ने फिर आगे भेजा ट्रेनिंग पर।
कसाब के पिता आमिर कसाब ने उसकी मुलाकात करवाई लश्कर के लोगों से। उनका दफ्तर उसके गांव में ही था। लश्कर के लोग गांव के गरीब घरों में अपने शिकार की तलाश में आते थे। नौजवानों को चुनते थे और उन्हें आतंकवादी बनाते थे। सुनिए कसाब का नया कबूलनामा। इसमें पुलिस और कसाब जिस चाचा का जिक्र कर रहे हैं दरअसल वो जकी उर्ररहमान लखवी है। मुंबई हमले का मास्टरमाइंड।
पुलिस-- तुम्हारे बाप औऱ चाचा की पहचान कैसे हुई।
कसाब- वो तो लाहौर में नहीं,,, गांव में किया था न उनसे।
पुलिस- गांव में चाचा आया था क्या।
कसाब-- गांव में और दिपालपुर में न उनका दफ्तर है।
पुलिस-- कौन सी जगह पर
कसाब--- दिपालपुर
पुलिस- किसका दफ्तर है
कसाब- चाचा वालों का
पुलिस- कितने लोग आते हैं वहां पर
कसाब- काफी लोग आते जाते हैं कुछ नए होते हैं। कुछ पुराने होते हैं।
पुलिस- दफ्तर में कौन कौन होता है
कसाब- भाईजान उधर बदलते रहते हैं बंदे। कन्फर्म नहीं होता। एक बंदा बैठता है। थोड़ी देऱ गुजर जाता है तो बंदा तफदीर। बंदा तफदीर। ऐसा होता है। ऐसे ही दावत देते हैं। जैसे मेरे बाप को। पता नहीं। उन लोगों ने क्या कहा। उसने मुझसे कहा जीमत वाला है। इसमें बहुत इज्जत होती है । ऐसा बोलते थे। मेरे बाप ने मुझको तआरुफ करवाया। फिर बाद में उसने मुझको लेक्चर दिया।
कसाब का पिता उसे धीरे-धीरे ऐसे नापाक राह पर धकेल रहा था। जिससे इज्जत का कोई लेना देना नहीं था। लेकिन लश्कर के लोगों ने उसे ऐसी सीख दी कि वो पैसे के लिए अपना आपा खो बैठा। उसने अपने हाथों से ही कसाब को नर्क में धक्का दे दिया।
पुलिस- तुम्हारी पहचान किसके साथ करके दी।
कसाब-- वो दफ्तर वालो के साथ। कि ये दफ्तर है बेटा। तूजा, अल्लाह की सफरत है। तेरी गरीबी दूर हो जाएगी। इज्जत बहुत आएगा।
सरकारी वकील उज्जवल निकम ने बताया कि वो काफी वक्त से कोशिश कर रहे थे, और आखिर कसाब ने अपना गुनाह कबूल कर ही लिया। सरकारी वकील ने ये भी बताया 9 बड़े आतंकियों के नाम भी लिए। उसने हमले के मास्टरमाइंड लखवी और हाफिज सईद का भी नाम लिया। विशेष सरकारी वकील ने ये भी बताया कि कसाब कितना शातिर है, और वो जितनी जल्दी दूसरी भाषाओं को सीख लेता है, वो हैरान करने वाला है। हिन्दी, अंग्रेजी और उर्द जानने वाला कसाब बहस के दौरान मराठी भी सीख चुका है।
कसाब बेहद शातिर है। कसाब ने पहली बार मुंबई पर हमले मामले में अपना गुनाह नहीं कबूला है। इससे पहले भी कसाब गुनाह कबूल कर चुका है। मुंबई पुलिस के सामने कसाब ने अपनी करतूतों को विस्तार से बताया था। कोर्ट में सच्चाई बयां करने से पहले ही कसाब ने जांच एजेंसियों के सामने पहली बार क्या खुलासा किया था। कोर्ट में कसाब के कबूलनामे से कई सनसनीखेज खुलासे हुए। सरकारी वकील ने कोर्ट को कसाब का 23 पेज का कबूलनामा सुनाया।
और इस कबूलनामे से एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ। कसाब के कबूलनामे के मुताबकि पाकिस्तान सेना का एक मेजरजनरल दो बार उसके कैंप में आया। उसके यानि लश्कर ऐ तैयबा के कैंप में। यही नहीं कसाब के कबूलनामे के मुताबिक इस मेजर जनरल ने मुंबई के मिशन पर निकलने वाले सभी दस आतंकियों की परीक्षा भी ली। उनसे उनके लक्ष्यों यानि कहां कहां हमला करना है इसके बारे में जानकारी मांगी। मुंबई के लोकेशन के बारे में। इस परीक्षा मे पास होने के बाद ही उन्हें मुंबई की तरफ भेजा गया।
आतंकी संगठन में शामिल होने से पहले कसाब की अपने पिता से बात हुई। या यूं कहें कि पिता ने ही उसे संगठन में शामिल कराया। इस मौके पर क्या क्या कहा कसाब से उसके पिता ने... क्या क्या सिखाया उसे। कैसे कसाब को ले गया वो लश्कर के दफ्तर में। कसाब ने ये सब खुलासा जांच एजेंसी के सामने किया था।
कसाब ने जो गुनाह किया है वो अजीम है। वो इंसानियत का दुश्मन है। महज चौथी तक पढ़े कसाब ने अपने पहले कबूलनामे में सबकुछ बताया है। उसने बताया कि उसके दो और भाई है। दो बहने हैं। मां का नाम नूर इलाही है। बड़े भाई की अफजल की शादी हो चुकी है। अफजल की शादी साफिया नाम की लड़की से हुई। उन्हें एक बेटा और एक बेटी है। लेकिन पैसे को लेकर कसाब के भाई और भाभी में झगड़ा हो गया। वो अलग रहने लगी। कसाब ने भी बड़े भाई के यहां जाना बंद कर दिया. क्योंकि पैसे को लेकर उसे भी खरी खोटी सुननी पड़ती थी। कसाब के पिता की कमाई पहले से ही कम थी। कसाब की माने तो पूरा मुद्दा सिर्फ और सिर्फ गरीबी का था। यही गरीबी ही थी जो उसे लश्कर तक ले गई। पिता ने उसकी उंगली पकड़ी। और उसे ले गए लश्कर के दफ्तर तक।
पुलिस और कसाब के बीच हुई वार्तालाप कुछ इस तरह से थी।
पुलिस- स्कूल कब छोड़ा तुमने
कसाब- 2000 में छोड़ा
पुलिस- उसके बाद क्या किया।
कसाब-- मजदूरी, पहले गांव में किया, फिर वहां से निकल गया।
पुलिस- मजदूरी यानि क्या क्या करता था
कसाब- मिस्त्री के साथ, रेती वगैरह, सीमेंट वगैरह
पुलिस- यानि बिल्डिंग का काम करता था
कसाब-- उसके बाद लाहौर चला आया।
पुलिस- कितने साल रहा उधर
कसाब-- उधर काफी देर रहा हूं, तकरीबन पांच साल
पुलिस-- पांच साल? यानि 2005 तक वहां रहता था?
कसाब-- हां तकरीबन, अभी फिर भी आता जाता था
पुलिस-- और 2005 के बाद
कसाब-- उसके बाद बस वही, कभी गांव में, कभी किधर, मजदूरी कोई ठीन नहीं मिल रही थी। काफी देर गुजर गया, फिर इनसे राब्ता करवाया बाप ने।
पुलिस- कैसा कैसा
कसाब--- बाप ने कहा था न, देख बेटा हम बहुत गरीब हैं। फलाह हैं। उसी ने उनसे मुलाकात करवाई, दफ्तर वालों से। दफ्तर वालों ने फिर आगे भेजा ट्रेनिंग पर।
कसाब के पिता आमिर कसाब ने उसकी मुलाकात करवाई लश्कर के लोगों से। उनका दफ्तर उसके गांव में ही था। लश्कर के लोग गांव के गरीब घरों में अपने शिकार की तलाश में आते थे। नौजवानों को चुनते थे और उन्हें आतंकवादी बनाते थे। सुनिए कसाब का नया कबूलनामा। इसमें पुलिस और कसाब जिस चाचा का जिक्र कर रहे हैं दरअसल वो जकी उर्ररहमान लखवी है। मुंबई हमले का मास्टरमाइंड।
पुलिस-- तुम्हारे बाप औऱ चाचा की पहचान कैसे हुई।
कसाब- वो तो लाहौर में नहीं,,, गांव में किया था न उनसे।
पुलिस- गांव में चाचा आया था क्या।
कसाब-- गांव में और दिपालपुर में न उनका दफ्तर है।
पुलिस-- कौन सी जगह पर
कसाब--- दिपालपुर
पुलिस- किसका दफ्तर है
कसाब- चाचा वालों का
पुलिस- कितने लोग आते हैं वहां पर
कसाब- काफी लोग आते जाते हैं कुछ नए होते हैं। कुछ पुराने होते हैं।
पुलिस- दफ्तर में कौन कौन होता है
कसाब- भाईजान उधर बदलते रहते हैं बंदे। कन्फर्म नहीं होता। एक बंदा बैठता है। थोड़ी देऱ गुजर जाता है तो बंदा तफदीर। बंदा तफदीर। ऐसा होता है। ऐसे ही दावत देते हैं। जैसे मेरे बाप को। पता नहीं। उन लोगों ने क्या कहा। उसने मुझसे कहा जीमत वाला है। इसमें बहुत इज्जत होती है । ऐसा बोलते थे। मेरे बाप ने मुझको तआरुफ करवाया। फिर बाद में उसने मुझको लेक्चर दिया।
कसाब का पिता उसे धीरे-धीरे ऐसे नापाक राह पर धकेल रहा था। जिससे इज्जत का कोई लेना देना नहीं था। लेकिन लश्कर के लोगों ने उसे ऐसी सीख दी कि वो पैसे के लिए अपना आपा खो बैठा। उसने अपने हाथों से ही कसाब को नर्क में धक्का दे दिया।
पुलिस- तुम्हारी पहचान किसके साथ करके दी।
कसाब-- वो दफ्तर वालो के साथ। कि ये दफ्तर है बेटा। तूजा, अल्लाह की सफरत है। तेरी गरीबी दूर हो जाएगी। इज्जत बहुत आएगा।
July 18, 2009
गाली-गलौज की गंदी राजनीति की जबर्दस्त स्क्रिप्टिंग
काफी जद्दोजहद और वाद विवाद के बाद आखिरकार रीता बहुगुणा जोशी को जमानत मिल ही गई। इस हाईप्रोफाइल गालीगलौज का पटाक्षेप इससे बेहतर और कुछ शायद राजनीतिक पंडितों ने नहीं सोचौ होगा। या फिर यूं कहें कि इस गालीगलौज के नाटक की स्क्रिप्टिंग इससे बेहतर नहीं हो सकती था। इस विवाद से एक बात तो सामने आ गई कि गाली गलौज करने के मामले में कांग्रेस भी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का फेहरिस्त में शामिल हो गई। हालांकि इस सब में एख शख्स ऐसा था जिसे सिर्फ रीता की जमानत से मतलब था। उसे इस कांड पर होरही राजनीति से कोई लेनादेना नहीं था। वो कोई औऱ नहीं रीता का बेटा मयंक था। मां रीता बहुगुणा को जमानत मिलने के बाद बेटा मयंक भी बेहद खुश नजर आया। सुबह मां से जब मिलने मयंक गया था, तब वो बिल्कुल अकेला था। उसके साथ कांग्रेस के एक भी नेता नहीं था। लेकिन इस वक्त खुशी के लम्हे में वो भीड़ से घिरा था।
इससे पहले आज लखनऊ में रीता की रिहाई और उनके घर पर आगजनी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कांग्रेसियों ने प्रदर्शन किया था। दूसरी तरफ वाराणसी में भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी इन्हीं मांगों को लेकर प्रदर्शन किया।
रीता बहुगुणा को जमानत मिलने के बाद अब कांग्रेस के निशाने पर पूरी तरह से माया सरकार और उसके विधायक होंगे। कांग्रेस की पूरी कोशिश होगी कि रीता बहुगुणा के घर आग लगाने वाले मुद्दे को हवा दी जाए। और उसके लिए केंद्र सरकार किसी भी मामले में बैकफुट पर आने के मूड में नहीं दिख रही है। अपनी पॉवर और पहुंच का फायदा उठाते हुए सरकारी तंत्र पूरी तरह से मीडिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। सभी प्राइवेट चैनलों पर इस बात की पूरी ताकीद कर दी गई है कि इस मुद्दे को हाथ से ना निकलने दिया जाए। और साथ ही आरोपी बीएसपी विधायक की गिरफ्तारी के लिए सरकार और पुलिस को मजबूर किया जाए। यहां ये याद दिला दें कि रीता बहुगुणा के घर में आग लगाने के मामले में एक बीएसपी विधायक के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। आरोपी विधायक का नाम जीतेंद्र सिंह बबलू है। जीतेंद्र सिंह यूपी के बीकापुर से बीएसपी विधायक हैं। इनके अलावा एक बीएसपी नेता इंतज़ार आब्दी और विधायक जीतेंद्र सिंह के कुछ समर्थकों के के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है।
लखनऊ में यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा के घर 15 जुलाई की रात कुछ लोगों ने आग लगा दी थी। आगजनी की इस घटना में रीता के घर का ज्यादातर सामान और 4 कारें जलकर राख हो गई थीं। रीता और उनके समर्थकों ने आगजनी के लिए बीएसपी कार्यकर्ताओं और विधायक जीतेंद्र सिंह पर आरोप लगाया था। लेकिन शुरू में मायावती ने इससे इनकार करते हुए कहा था कि आगजनी के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। लेकिन अब बीएसपी विधायक पर केस दर्ज होने से धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगी है।
मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल के आरोप में 14 दिन की न्यायिक हिरासत काट रहीं रीता बहुगुणा की जमानत याचिका पर आज फिर सुनवाई होगी। शुक्रवार को रीता की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी थी लेकिन सर्विस टैक्स के मुद्दे को लेकर वकील हड़ताल पर थे। जिसकी वजह से रीता की जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं हो सकी थी।
जहरीली जबान बोलने पर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजी गई रीता क्या आज जेल से बाहर आईं। जो अडंगा शुक्रवार को लग गया था, वो आज भी कायम था लेकिन भाग्य की धनी या फिर सियासत की धनी रीता को आखिर जमानत मिल ही गई। रीता पर अभद्र भाषा के इस्तेमाल के अलावा एससी एसटी एक्ट एक्ट का मामला है। हालांकि उनके वकीलों को भरोसा है कि अगर सुनवाई हुई तो रीता पर लगे आरोप स्टैंड नहीं कर पाएंगे, और हुआ भी वही।
इससे पहले आज लखनऊ में रीता की रिहाई और उनके घर पर आगजनी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कांग्रेसियों ने प्रदर्शन किया था। दूसरी तरफ वाराणसी में भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी इन्हीं मांगों को लेकर प्रदर्शन किया।
रीता बहुगुणा को जमानत मिलने के बाद अब कांग्रेस के निशाने पर पूरी तरह से माया सरकार और उसके विधायक होंगे। कांग्रेस की पूरी कोशिश होगी कि रीता बहुगुणा के घर आग लगाने वाले मुद्दे को हवा दी जाए। और उसके लिए केंद्र सरकार किसी भी मामले में बैकफुट पर आने के मूड में नहीं दिख रही है। अपनी पॉवर और पहुंच का फायदा उठाते हुए सरकारी तंत्र पूरी तरह से मीडिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। सभी प्राइवेट चैनलों पर इस बात की पूरी ताकीद कर दी गई है कि इस मुद्दे को हाथ से ना निकलने दिया जाए। और साथ ही आरोपी बीएसपी विधायक की गिरफ्तारी के लिए सरकार और पुलिस को मजबूर किया जाए। यहां ये याद दिला दें कि रीता बहुगुणा के घर में आग लगाने के मामले में एक बीएसपी विधायक के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। आरोपी विधायक का नाम जीतेंद्र सिंह बबलू है। जीतेंद्र सिंह यूपी के बीकापुर से बीएसपी विधायक हैं। इनके अलावा एक बीएसपी नेता इंतज़ार आब्दी और विधायक जीतेंद्र सिंह के कुछ समर्थकों के के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है।
लखनऊ में यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा के घर 15 जुलाई की रात कुछ लोगों ने आग लगा दी थी। आगजनी की इस घटना में रीता के घर का ज्यादातर सामान और 4 कारें जलकर राख हो गई थीं। रीता और उनके समर्थकों ने आगजनी के लिए बीएसपी कार्यकर्ताओं और विधायक जीतेंद्र सिंह पर आरोप लगाया था। लेकिन शुरू में मायावती ने इससे इनकार करते हुए कहा था कि आगजनी के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। लेकिन अब बीएसपी विधायक पर केस दर्ज होने से धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगी है।
मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल के आरोप में 14 दिन की न्यायिक हिरासत काट रहीं रीता बहुगुणा की जमानत याचिका पर आज फिर सुनवाई होगी। शुक्रवार को रीता की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी थी लेकिन सर्विस टैक्स के मुद्दे को लेकर वकील हड़ताल पर थे। जिसकी वजह से रीता की जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं हो सकी थी।
जहरीली जबान बोलने पर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजी गई रीता क्या आज जेल से बाहर आईं। जो अडंगा शुक्रवार को लग गया था, वो आज भी कायम था लेकिन भाग्य की धनी या फिर सियासत की धनी रीता को आखिर जमानत मिल ही गई। रीता पर अभद्र भाषा के इस्तेमाल के अलावा एससी एसटी एक्ट एक्ट का मामला है। हालांकि उनके वकीलों को भरोसा है कि अगर सुनवाई हुई तो रीता पर लगे आरोप स्टैंड नहीं कर पाएंगे, और हुआ भी वही।
कौमार्य परीक्षण या बेइज्जती

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में लड़कियों के कौमार्य परीक्षण पर मचा बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। दो आदिवासी लड़कियों ने शहडोल जिले के पूर्व कलेक्टर समेत तीन अफसरों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। सरोज और आरती नाम की इन गरीब लड़कियों की अर्जी चौंकाने वाली है। लड़कियों ने आरोप लगाया है कि जबरन उनका कौमार्य परीक्षण किया गया।
सरोज और आरती उन 150 गरीब लड़कियों में शामिल हैं जिनका साढ़े छह हज़ार रूपये के सरकारी दहेज की खातिर मेडिकल टेस्ट किया गया। आरोप है कि टेस्ट के नाम पर उनके साथ शर्मनाक सुलूक किया गया। एससी/एसटी थाने में सरोज ने शिकायत की है कि मेडिकल टेस्ट को मना करने पर CEO संतोष पटेल ने कहा कि बैगा आदिवासी लड़कियों का क्या भरोसा कि वो कुंवारी हैं या गर्भवती।
फिर महिला चिकित्सक ने उसका मेडिकल चेकअप किया। इससे वो खुद को अपमानित महसूस कर रही है। सरोज की पूरी शिकायत को सहां लिखा नहीं जा सकता। लेकिन उसका एक एक लफ्ज सरकारी अफसरों की बेशर्मी बयान कर रहा था। दूसरी लड़की आरती ने भी बताया कि कैसे शिवराज के राज में लड़कियों के साथ बुरा बर्ताब किया गया। उसका कहना था कि उसके पेट पर हाथ रखकर लेडी डॉक्टर ने चैक किया। उसे ऐसा करना अच्छा नहीं लगा। मुख्यमंत्री बहू बेटी मानते हैं औऱ ऐसा काम करवाते हैं।
सोहागपुर में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत घर बसाने आईं 150 लड़कियों में से 138 को शादी के सरकारी मंडप में तब बैठने की इजाजत मिली जब ये तय हो गया कि वो गर्भवती नहीं हैं। बारह लड़कियां मंडप में नहीं बैठ पाईं क्योंकि वो गर्भवती थीं।
शिकायत के बाबजूद पुलिस ने अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया है। वो सिर्फ जांच का राग अलाप रही है। उनका कहना है कि पूर्व कलेक्टर, जनपद पंचायत के सीईओ औऱ समाज कल्याण कल्याण के खिलाफ़ शिकायत आई है वो जांच कर रहे हैं फिर कार्रवाई करेंगे।
हद तो तब हो गई जब हंगामा मचते ही मध्यप्रदेश महिला आयोग ने तुंरत शिवराज सरकार को क्लीन चिट दे दी। अब राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम शहडोल में लड़कियों के बयान दर्ज कर रही है। और लड़कियां शिकायत की अर्जी लिए शिवराज के अफसरों की तरफ ताक रही हैं कि शायद उन्हे इंसाफ मिल सके। हिन्दुस्तान की संस्कृति औऱ अस्मिता की दुहाई देने वाली बीजेपी। वो हिन्दुस्तान जिसमें औरत को देवी का दर्जा मिलता है। लेकिन शिवराज के राज में अफ़सरों ने दुनिया को दिखा दिया है कि वो औऱत का कितना सम्मान करते हैं।
July 16, 2009
आखिर कब तक ?
दस साल पहले हमने कारगिल युद्ध का सामना किया था। देश ने लगभग 527 जवान खोकर इस युद्ध में दुश्मन देश पाकिस्तान को परास्त कर दिया था। लेकिन नक्सलवाद के रूप में हम न जाने कितने कारगिल जैसे युद्ध लड़ चुके हैं और हमें कोई सफलता भी नहीं मिली है। वैसे तो देश में नक्सलवाद की लड़ाई दो दशक से भी पुरानी है, लेकिन पिछले पांच सालों पर नजर डालें तो तीन हजार से अधिक लोग इस लड़ाई की भेंट चढ़ चुके हैं। इतना ही नहीं हजार से अधिक जवान भी शहीद हो चुके हैं। सिर्फ इस साल ही अब तक 6 महीनों में 230 जवान समेत लगभग 485 लोगों की मौत हो चुकी है। देश में नक्सलवाद पर पेश है एक खास रिपोर्ट..
इस साल सबसे अधिक
देश में नक्सल प्रॉब्लम दिन पर दिन विकराल रूप लेती जा रही है। वैसे तो यह प्रॉब्लम शुरू हुई थी सत्तार के दशक में लेकिन दो दशक पहले इसका हिंसक रूप सामने आया। पिछले पांच सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल सबसे अधिक घटनाएं सामने आई हैं। इस साल के 6 महीनों में ही 1130 घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि लास्ट इयर सेम पीरियड में 766 मामले सामने आए थे। इतना ही नहीं इस वर्ष अब तक कुछ 485 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 230 जवान और 255 आम नागरिक थे।
37000 सोल्जर्स
नक्सलवाद की यह लड़ाई कितनी बड़ी है इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस समय लगभग 37 बटालियन पैरामिलिट्री फोर्स यानी 37000 सोल्जर्स जंग से लड़ने के लिए लगाए गए हैं।
छत्तीसगढ़ में अधिक
वैसे तो देश के लगभग 12 स्टेट नक्सलवाद की इस समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन छत्ताीसगढ़ में प्रॉब्लम सबसे अधिक सीरियस बनी हुई है। पिछले दिनों में यहां एक नक्सली हमले में एसपी समेत 36 लोगों की जान चली गई थी। यहां की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पूरे देश में नक्सलवाद से मुकाबले के लिए लगीं कुछ 37 बटालियन में 17 बटालियन यानी 17 हजार जवान अकेले छत्ताीसगढ़ में लगाए गए हैं। साथ ही देश में कुल होने वाली नक्सली घटनाओं में 82 परसेंट घटनाएं छत्ताीसगढ़, बिहार, झारखंड और उड़ीसा में संयुक्त रूप से होती हैं। इसके साथ ही कुल होने वाली कैजुअल्टीज का 77 परसेंट इन्हीं स्टेट्स में हुई हैं।
इतिहास के झरोखे से
नक्सलाइट्स टर्म वेस्ट बंगाल के एक स्माल विलेज नक्सलवारी से आया है। जहां कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का एक भाग चारू मजूमदार और कानू सांन्याल के नेतृत्व में 1967 में हिंसक हो गया, जिसने सीपीआई लीडरशीप के खिलाफ ही रिवेल्यूशनरी अपोजिशन डेवलप करने की कोशिश की। विद्रोह की शुरुआत 25 मई 1967 में नक्सलबारी विलेज में उस समय हुई जब एक किसान पर भूमि विवाद को लेकर हमला किया गया। मजूमदार चीन के माओ जेडांग से इंस्पायर था और भारतीय किसानों और लोअर क्लास की जमीनों को गिरवी रखने के लिए वह गवर्नमेंट और अपर क्लास को जिम्मेदार ठहराने लगा। इसके बाद नक्सलाइट मूवमेंट का जन्म हुआ। 1967 में नक्सलाइट ने आल इंडिया कोआर्डिनेशन कमेटी आफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरीज संगठित किया जो बाद में सीपीआई (एम) में बंट गया। 1969 में एआईसीसीसीआर ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (मार्सिस्ट-लेनिनिस्ट) को जन्म दिया। प्रेक्टिकली धीरे-धीर सभी नक्सलाइट ग्रुप्स अपने ओरिजिन सीपीआई (एमएल) से पहचाने जाने लगे। 1980 में तीस नक्सलाइट ग्रुप्स 30 हजार कंबाइंड मेंबरशिप के साथ सक्रिय हुआ। भूमि और सामान्तवाद की यह लड़ाई धीरे-धीरे खूनी जंग का रूप लेने लगी। नक्स्लवाड़ी से पूरा वेस्ट बंगाल फिर उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, बिहारी, छत्ताीसगढ़ के साथ देश के लगभग एक दर्जन राज्यों में यह एक समस्या के रूप में सामने आया।
नक्सल का आतंक बढ़ता ही जा रहा है. नक्सली आए दिन अटैक कर रहे हैं. नक्सली अक्सर खाकी वर्दी को अपना निशाना बनाते हैं. वामपंथी नक्सलवाद देश के 630 डिस्ट्रिक्ट में से 180 को अपनी चपेट में ले चुका है। देशभर में इनके करीब 22 हजार कैडर हैं।
झारखंड
पूरा स्टेट माओवाद की चपेट में, लेकिन 24 में से 16 डिस्ट्रिक्ट बुरी तरह पीड़ित हैं. स्टेट में माओवादियों के छह प्रमुख ग्रुप काम कर रहे हैं. तृतीया प्रस्तुति कमेटी, झारखंड प्रस्तुति कमेटी, द पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया, झारखंड जनसंघर्ष मुक्ति मोर्चा, संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा वसीपीआई (एम)।
उड़ीसा
यह स्टेट भी अधिकांश लाल रंग में रंग चुका है, लेकिन कुल 30 डिस्ट्रिक्ट्स में से आंध्र प्रदेश व छत्ताीसगढ़ से सटी सीमा के 17 डिस्ट्रिक्ट माओवाद से भयंकर रुप से ग्रस्त हैं। दक्षिणी उड़ीसा के मलकानगिरि, कोरापुट, रायगढ़, गजपति डिस्ट्रिक्ट्स में इनकी मजबूत उपस्थिति है। आदिवासी बहुल्य कंधमाल में भी अच्छा नेटवर्क है। उड़ीसा के डिस्ट्रिक्ट्स सुंदरगढ़, देवगढ़, संभलपुर बौध और अंगुल में तेजी से फैलाव।
बिहार
इस स्टेट के 38 में से 19 डिस्ट्रिक्ट्स में अच्छा खासा प्रभाव, पहले से इनकी मौजूदगी वाले पटना, गया, औरंगाबाद, भभुआ, रोहतास ओर जहानाबाद के अलावा अब इनका फैलाव उत्तार की तरफ हो रहा है। पश्चिमी चंपारण, पू. चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मघुबनी इनके नए विस्तार क्षेत्र हैं. सहरसा, वेगूसराय, वैशाली और उत्तार प्रदेश से सटे एरियाज में भी इनका प्रभाव है।
छत्ताीसगढ़
30 साल से माओवाद समस्या ने खनिज संपदा से धनी इस स्टेट की हालत को बदतर करने में मेन रोल निभाया है। 10 डिस्ट्रिक्ट्स के 150 पुलिस थाने गंभीर रुप से संवेदनशील. दंतेवाड़ा, कांकेर, बस्तर, बलरामपुर ओर सारगुजा डिस्ट्रिक्ट्स में माओवादियों की जड़े मजबूत।
आंध्र प्रदेश
स्टेट के दंडकारण्य एरिया में इनका खतरा बना हुआ है. विशाखापट्नम, विजयानगरम, खम्माम और पूर्वी गोदावरी डिस्ट्रिक्ट्स में मजबूत नेटवर्क।
महाराष्ट्र
गढ़चिरौली इनका गढ़ है जबकि चंद्रपुर गोडिंया, यवतमाल, भंडारा और नांदेड़ जैसे डिस्ट्रिक्ट नक्सलग्रस्त घोषित। ये सभी जिले आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित एरियाज से सटे हुए हैं।
इस साल सबसे अधिक
देश में नक्सल प्रॉब्लम दिन पर दिन विकराल रूप लेती जा रही है। वैसे तो यह प्रॉब्लम शुरू हुई थी सत्तार के दशक में लेकिन दो दशक पहले इसका हिंसक रूप सामने आया। पिछले पांच सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल सबसे अधिक घटनाएं सामने आई हैं। इस साल के 6 महीनों में ही 1130 घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि लास्ट इयर सेम पीरियड में 766 मामले सामने आए थे। इतना ही नहीं इस वर्ष अब तक कुछ 485 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 230 जवान और 255 आम नागरिक थे।
37000 सोल्जर्स
नक्सलवाद की यह लड़ाई कितनी बड़ी है इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस समय लगभग 37 बटालियन पैरामिलिट्री फोर्स यानी 37000 सोल्जर्स जंग से लड़ने के लिए लगाए गए हैं।
छत्तीसगढ़ में अधिक
वैसे तो देश के लगभग 12 स्टेट नक्सलवाद की इस समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन छत्ताीसगढ़ में प्रॉब्लम सबसे अधिक सीरियस बनी हुई है। पिछले दिनों में यहां एक नक्सली हमले में एसपी समेत 36 लोगों की जान चली गई थी। यहां की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पूरे देश में नक्सलवाद से मुकाबले के लिए लगीं कुछ 37 बटालियन में 17 बटालियन यानी 17 हजार जवान अकेले छत्ताीसगढ़ में लगाए गए हैं। साथ ही देश में कुल होने वाली नक्सली घटनाओं में 82 परसेंट घटनाएं छत्ताीसगढ़, बिहार, झारखंड और उड़ीसा में संयुक्त रूप से होती हैं। इसके साथ ही कुल होने वाली कैजुअल्टीज का 77 परसेंट इन्हीं स्टेट्स में हुई हैं।
इतिहास के झरोखे से
नक्सलाइट्स टर्म वेस्ट बंगाल के एक स्माल विलेज नक्सलवारी से आया है। जहां कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का एक भाग चारू मजूमदार और कानू सांन्याल के नेतृत्व में 1967 में हिंसक हो गया, जिसने सीपीआई लीडरशीप के खिलाफ ही रिवेल्यूशनरी अपोजिशन डेवलप करने की कोशिश की। विद्रोह की शुरुआत 25 मई 1967 में नक्सलबारी विलेज में उस समय हुई जब एक किसान पर भूमि विवाद को लेकर हमला किया गया। मजूमदार चीन के माओ जेडांग से इंस्पायर था और भारतीय किसानों और लोअर क्लास की जमीनों को गिरवी रखने के लिए वह गवर्नमेंट और अपर क्लास को जिम्मेदार ठहराने लगा। इसके बाद नक्सलाइट मूवमेंट का जन्म हुआ। 1967 में नक्सलाइट ने आल इंडिया कोआर्डिनेशन कमेटी आफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरीज संगठित किया जो बाद में सीपीआई (एम) में बंट गया। 1969 में एआईसीसीसीआर ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (मार्सिस्ट-लेनिनिस्ट) को जन्म दिया। प्रेक्टिकली धीरे-धीर सभी नक्सलाइट ग्रुप्स अपने ओरिजिन सीपीआई (एमएल) से पहचाने जाने लगे। 1980 में तीस नक्सलाइट ग्रुप्स 30 हजार कंबाइंड मेंबरशिप के साथ सक्रिय हुआ। भूमि और सामान्तवाद की यह लड़ाई धीरे-धीरे खूनी जंग का रूप लेने लगी। नक्स्लवाड़ी से पूरा वेस्ट बंगाल फिर उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, बिहारी, छत्ताीसगढ़ के साथ देश के लगभग एक दर्जन राज्यों में यह एक समस्या के रूप में सामने आया।
नक्सल का आतंक बढ़ता ही जा रहा है. नक्सली आए दिन अटैक कर रहे हैं. नक्सली अक्सर खाकी वर्दी को अपना निशाना बनाते हैं. वामपंथी नक्सलवाद देश के 630 डिस्ट्रिक्ट में से 180 को अपनी चपेट में ले चुका है। देशभर में इनके करीब 22 हजार कैडर हैं।
झारखंड
पूरा स्टेट माओवाद की चपेट में, लेकिन 24 में से 16 डिस्ट्रिक्ट बुरी तरह पीड़ित हैं. स्टेट में माओवादियों के छह प्रमुख ग्रुप काम कर रहे हैं. तृतीया प्रस्तुति कमेटी, झारखंड प्रस्तुति कमेटी, द पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया, झारखंड जनसंघर्ष मुक्ति मोर्चा, संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा वसीपीआई (एम)।
उड़ीसा
यह स्टेट भी अधिकांश लाल रंग में रंग चुका है, लेकिन कुल 30 डिस्ट्रिक्ट्स में से आंध्र प्रदेश व छत्ताीसगढ़ से सटी सीमा के 17 डिस्ट्रिक्ट माओवाद से भयंकर रुप से ग्रस्त हैं। दक्षिणी उड़ीसा के मलकानगिरि, कोरापुट, रायगढ़, गजपति डिस्ट्रिक्ट्स में इनकी मजबूत उपस्थिति है। आदिवासी बहुल्य कंधमाल में भी अच्छा नेटवर्क है। उड़ीसा के डिस्ट्रिक्ट्स सुंदरगढ़, देवगढ़, संभलपुर बौध और अंगुल में तेजी से फैलाव।
बिहार
इस स्टेट के 38 में से 19 डिस्ट्रिक्ट्स में अच्छा खासा प्रभाव, पहले से इनकी मौजूदगी वाले पटना, गया, औरंगाबाद, भभुआ, रोहतास ओर जहानाबाद के अलावा अब इनका फैलाव उत्तार की तरफ हो रहा है। पश्चिमी चंपारण, पू. चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मघुबनी इनके नए विस्तार क्षेत्र हैं. सहरसा, वेगूसराय, वैशाली और उत्तार प्रदेश से सटे एरियाज में भी इनका प्रभाव है।
छत्ताीसगढ़
30 साल से माओवाद समस्या ने खनिज संपदा से धनी इस स्टेट की हालत को बदतर करने में मेन रोल निभाया है। 10 डिस्ट्रिक्ट्स के 150 पुलिस थाने गंभीर रुप से संवेदनशील. दंतेवाड़ा, कांकेर, बस्तर, बलरामपुर ओर सारगुजा डिस्ट्रिक्ट्स में माओवादियों की जड़े मजबूत।
आंध्र प्रदेश
स्टेट के दंडकारण्य एरिया में इनका खतरा बना हुआ है. विशाखापट्नम, विजयानगरम, खम्माम और पूर्वी गोदावरी डिस्ट्रिक्ट्स में मजबूत नेटवर्क।
महाराष्ट्र
गढ़चिरौली इनका गढ़ है जबकि चंद्रपुर गोडिंया, यवतमाल, भंडारा और नांदेड़ जैसे डिस्ट्रिक्ट नक्सलग्रस्त घोषित। ये सभी जिले आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित एरियाज से सटे हुए हैं।
July 15, 2009
तैनाती के लिए तैयार

कभी न खत्म होने वाले इंतजार के बाद ड्राईडॉक, जहां भारत की पहली परमाणु पमडुब्बी निर्मित की जा रही है, के कपाट आखिरकार समुद्र के लिए खोल दिए जाएंगे। विशाखापत्तनम के नौसेना डॉकयार्ड में एडवांस्ड टेक्लोलॉजी वेस्सल(एटीवी) का उद्घाटन 26 जुलाई को किए जाने की संभावना है। विजय दिवस के रूप में मनाई जाने वाली यत तारीख कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी घुस्पैठियों को हटाए जाने की 10वीं वर्षगांठ है। 6000 टन की पनडुब्बी- जो अर्से से भारतीय प्रतिरक्षा का सबसे गोपनीय रहस्य थी- का उद्घाटन नौसेना और डीआरडाओ की उस संयुक्त परियोजना का हिस्सा, जिसके तहत पानी के भीतर से दुश्मन पर गुप्त परमाणु अस्त्र वार करने में क्षमता विकसित की जानी है। इस पनडुब्बी (रूस की चार्ली समूह का परिश्कृत डिजाइन, जिसे आइएनएस चक्र के तौर पर उपयोग किया) के प्रयोग के साथ ही भारत परमाणु पनडुब्बी का प्रयोग करने वाला दुनिया का छठा देश बन जाएगा। इसकी शुरुआत दो साल पहले उस प्रक्रिया का पहला कदम है जिसके तहत पनडुब्बियों के समुद्री परीक्षण के पहले इनके परमाणु रिएक्टरों और प्रणालियों का परीक्षण किया जाएगा। नौसेना डॉकयार्ड में स्थित ड्राईडॉक शिपबिल्दिंग सेंटर में दो और जलपोतों का निर्माण किया जा रहा है।
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