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Varanasi, UP, India
Working with an MNC called Network 18, some call it news channel(IBN7), but i call it दफ्तर, journalist by heart and soul, and i question everything..

July 20, 2009

कसाब आखिर कबूला अपना जुर्म

26 नवंबर 2009 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के आरोपी आमिर अजमल कसाब ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। कसाब ने स्पेशल कोर्ट में हमले की पूरी कहानी सुनाई। उसने सिलसिलेवार तरीके से पाकिस्तानी साजिश का खुलासा किया। उसने बताया कि किस तरह वो कराची से मुंबई समंदर के रास्ते आया। मुंबई आने के बाद कसाब ने किस तरह खून-खराबा किया। इसके बारे में कसाब ने कोर्ट को विस्तार से बताया। कसाब ने माना कि कामा अस्पताल में उसने बेकसूर लोगों का खून बहाया। मुख्य आरोपी अजमल कसाब ने अदालत को बताया कि किस तरह वो कराची से बोट से अपने नौ साथियों के साथ मुंबई पहुंचा था। उसने अदालत को बताया कि वो कामा अस्पताल और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हुए हमले में शामिल था। कसाब ने अपने साथियों में अबू हमजा और लखवी का नाम भी बताया। कोर्ट ने कसाब का बयान दर्ज कर लिया है।

सरकारी वकील उज्जवल निकम ने बताया कि वो काफी वक्त से कोशिश कर रहे थे, और आखिर कसाब ने अपना गुनाह कबूल कर ही लिया। सरकारी वकील ने ये भी बताया 9 बड़े आतंकियों के नाम भी लिए। उसने हमले के मास्टरमाइंड लखवी और हाफिज सईद का भी नाम लिया। विशेष सरकारी वकील ने ये भी बताया कि कसाब कितना शातिर है, और वो जितनी जल्दी दूसरी भाषाओं को सीख लेता है, वो हैरान करने वाला है। हिन्दी, अंग्रेजी और उर्द जानने वाला कसाब बहस के दौरान मराठी भी सीख चुका है।

कसाब बेहद शातिर है। कसाब ने पहली बार मुंबई पर हमले मामले में अपना गुनाह नहीं कबूला है। इससे पहले भी कसाब गुनाह कबूल कर चुका है। मुंबई पुलिस के सामने कसाब ने अपनी करतूतों को विस्तार से बताया था। कोर्ट में सच्चाई बयां करने से पहले ही कसाब ने जांच एजेंसियों के सामने पहली बार क्या खुलासा किया था। कोर्ट में कसाब के कबूलनामे से कई सनसनीखेज खुलासे हुए। सरकारी वकील ने कोर्ट को कसाब का 23 पेज का कबूलनामा सुनाया।

और इस कबूलनामे से एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ। कसाब के कबूलनामे के मुताबकि पाकिस्तान सेना का एक मेजरजनरल दो बार उसके कैंप में आया। उसके यानि लश्कर ऐ तैयबा के कैंप में। यही नहीं कसाब के कबूलनामे के मुताबिक इस मेजर जनरल ने मुंबई के मिशन पर निकलने वाले सभी दस आतंकियों की परीक्षा भी ली। उनसे उनके लक्ष्यों यानि कहां कहां हमला करना है इसके बारे में जानकारी मांगी। मुंबई के लोकेशन के बारे में। इस परीक्षा मे पास होने के बाद ही उन्हें मुंबई की तरफ भेजा गया।

आतंकी संगठन में शामिल होने से पहले कसाब की अपने पिता से बात हुई। या यूं कहें कि पिता ने ही उसे संगठन में शामिल कराया। इस मौके पर क्या क्या कहा कसाब से उसके पिता ने... क्या क्या सिखाया उसे। कैसे कसाब को ले गया वो लश्कर के दफ्तर में। कसाब ने ये सब खुलासा जांच एजेंसी के सामने किया था।

कसाब ने जो गुनाह किया है वो अजीम है। वो इंसानियत का दुश्मन है। महज चौथी तक पढ़े कसाब ने अपने पहले कबूलनामे में सबकुछ बताया है। उसने बताया कि उसके दो और भाई है। दो बहने हैं। मां का नाम नूर इलाही है। बड़े भाई की अफजल की शादी हो चुकी है। अफजल की शादी साफिया नाम की लड़की से हुई। उन्हें एक बेटा और एक बेटी है। लेकिन पैसे को लेकर कसाब के भाई और भाभी में झगड़ा हो गया। वो अलग रहने लगी। कसाब ने भी बड़े भाई के यहां जाना बंद कर दिया. क्योंकि पैसे को लेकर उसे भी खरी खोटी सुननी पड़ती थी। कसाब के पिता की कमाई पहले से ही कम थी। कसाब की माने तो पूरा मुद्दा सिर्फ और सिर्फ गरीबी का था। यही गरीबी ही थी जो उसे लश्कर तक ले गई। पिता ने उसकी उंगली पकड़ी। और उसे ले गए लश्कर के दफ्तर तक।

पुलिस और कसाब के बीच हुई वार्तालाप कुछ इस तरह से थी।

पुलिस- स्कूल कब छोड़ा तुमने

कसाब- 2000 में छोड़ा

पुलिस- उसके बाद क्या किया।

कसाब-- मजदूरी, पहले गांव में किया, फिर वहां से निकल गया।

पुलिस- मजदूरी यानि क्या क्या करता था

कसाब- मिस्त्री के साथ, रेती वगैरह, सीमेंट वगैरह

पुलिस- यानि बिल्डिंग का काम करता था

कसाब-- उसके बाद लाहौर चला आया।

पुलिस- कितने साल रहा उधर

कसाब-- उधर काफी देर रहा हूं, तकरीबन पांच साल

पुलिस-- पांच साल? यानि 2005 तक वहां रहता था?

कसाब-- हां तकरीबन, अभी फिर भी आता जाता था

पुलिस-- और 2005 के बाद

कसाब-- उसके बाद बस वही, कभी गांव में, कभी किधर, मजदूरी कोई ठीन नहीं मिल रही थी। काफी देर गुजर गया, फिर इनसे राब्ता करवाया बाप ने।

पुलिस- कैसा कैसा

कसाब--- बाप ने कहा था न, देख बेटा हम बहुत गरीब हैं। फलाह हैं। उसी ने उनसे मुलाकात करवाई, दफ्तर वालों से। दफ्तर वालों ने फिर आगे भेजा ट्रेनिंग पर।

कसाब के पिता आमिर कसाब ने उसकी मुलाकात करवाई लश्कर के लोगों से। उनका दफ्तर उसके गांव में ही था। लश्कर के लोग गांव के गरीब घरों में अपने शिकार की तलाश में आते थे। नौजवानों को चुनते थे और उन्हें आतंकवादी बनाते थे। सुनिए कसाब का नया कबूलनामा। इसमें पुलिस और कसाब जिस चाचा का जिक्र कर रहे हैं दरअसल वो जकी उर्ररहमान लखवी है। मुंबई हमले का मास्टरमाइंड।

पुलिस-- तुम्हारे बाप औऱ चाचा की पहचान कैसे हुई।

कसाब- वो तो लाहौर में नहीं,,, गांव में किया था न उनसे।

पुलिस- गांव में चाचा आया था क्या।

कसाब-- गांव में और दिपालपुर में न उनका दफ्तर है।

पुलिस-- कौन सी जगह पर

कसाब--- दिपालपुर

पुलिस- किसका दफ्तर है

कसाब- चाचा वालों का

पुलिस- कितने लोग आते हैं वहां पर

कसाब- काफी लोग आते जाते हैं कुछ नए होते हैं। कुछ पुराने होते हैं।

पुलिस- दफ्तर में कौन कौन होता है

कसाब- भाईजान उधर बदलते रहते हैं बंदे। कन्फर्म नहीं होता। एक बंदा बैठता है। थोड़ी देऱ गुजर जाता है तो बंदा तफदीर। बंदा तफदीर। ऐसा होता है। ऐसे ही दावत देते हैं। जैसे मेरे बाप को। पता नहीं। उन लोगों ने क्या कहा। उसने मुझसे कहा जीमत वाला है। इसमें बहुत इज्जत होती है । ऐसा बोलते थे। मेरे बाप ने मुझको तआरुफ करवाया। फिर बाद में उसने मुझको लेक्चर दिया।

कसाब का पिता उसे धीरे-धीरे ऐसे नापाक राह पर धकेल रहा था। जिससे इज्जत का कोई लेना देना नहीं था। लेकिन लश्कर के लोगों ने उसे ऐसी सीख दी कि वो पैसे के लिए अपना आपा खो बैठा। उसने अपने हाथों से ही कसाब को नर्क में धक्का दे दिया।

पुलिस- तुम्हारी पहचान किसके साथ करके दी।

कसाब-- वो दफ्तर वालो के साथ। कि ये दफ्तर है बेटा। तूजा, अल्लाह की सफरत है। तेरी गरीबी दूर हो जाएगी। इज्जत बहुत आएगा।

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